Indian Startups का महा-विलय: फंडिंग की तंगी और नए नियमों ने बढ़ाई रफ्तार, जानिए क्यों?

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Startups का महा-विलय: फंडिंग की तंगी और नए नियमों ने बढ़ाई रफ्तार, जानिए क्यों?
Overview

Indian startups में आजकल विलय (Merger) का दौर तेज हो गया है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बाहर से मिलने वाला फंड (Funding) कम हो गया है और खरीदार भी ज्यादा नहीं मिल रहे। वहीं, अगस्त और सितंबर 2024 में आए नए नियमों ने डोमेस्टिक और क्रॉस-बॉर्डर डील को आसान बना दिया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब टिके रहने या एग्जिट (Exit) करने के लिए कंसॉलिडेशन (Consolidation) ही रास्ता बचा है।

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क्यों साथ आ रही हैं स्टार्टअप्स?

अब भारतीय स्टार्टअप्स के लिए मर्जर (Merger) सिर्फ एक मौका नहीं, बल्कि टिके रहने की मजबूरी बनता जा रहा है। अकेले बिजनेस चलाना अब काफी मुश्किल हो गया है, इसलिए कंपनियां एक-दूसरे से हाथ मिला रही हैं। प्राइवेट फंडिंग में आई भारी कमी और रेगुलेटरी बदलावों के मेल ने एक ऐसी स्थिति बना दी है, जहां ग्रोथ, बेहतर कैपिटल इस्तेमाल और क्लियर एग्जिट (Exit) के लिए स्टार्टअप्स विलय की ओर बढ़ रहे हैं।

फंडिंग की किल्लत और धीमी रफ्तार

भारत का टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम (Tech Startup Ecosystem), अपनी ग्लोबल पहचान के बावजूद, बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। 2022 में जहां करीब $25 बिलियन की फंडिंग मिली थी, वहीं 2023 में यह घटकर $10 बिलियन रह गई। 2024 में इसमें थोड़ी रिकवरी आई है और यह $11.3 बिलियन तक पहुंची है। लेकिन, यह पैसा सिर्फ कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों को ही मिला है। कई अच्छी स्टार्टअप्स को बार-बार फ्लैट वैल्यूएशन (Flat Valuation) पर ब्रिज फंडिंग (Bridge Funding) लेनी पड़ रही है, क्योंकि मुख्य ग्रोथ कैपिटल (Growth Capital) मिलना मुश्किल हो गया है। भारत में स्ट्रैटेजिक खरीदारों (Strategic Buyers) की कमी इस फंड की कमी को और बढ़ा देती है, जबकि अमेरिका जैसे बाजारों में बड़ी टेक कंपनियां अक्सर अधिग्रहण करती रहती हैं। दुनिया भर में, वेंचर एग्जिट (Venture Exit) का 40-50% हिस्सा मर्जर और एक्विजिशन (M&A) से आता है, लेकिन भारत में यह आंकड़ा सिर्फ 10% के आसपास है। ऐसे में, जब बाहरी खरीदार आसानी से नहीं मिलते, तो स्टार्टअप्स को सक्रिय रूप से विलय की तलाश करनी पड़ती है।

आसान हुए मर्जर के रास्ते

हालिया रेगुलेटरी बदलावों ने M&A प्रोसेस को काफी आसान बना दिया है। अगस्त 2024 में, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने फॉरेन एक्सचेंज रूल्स (Foreign Exchange Rules) में बदलाव कर क्रॉस-बॉर्डर शेयर स्वैप (Cross-border Share Swap) को ऑटोमैटिक अप्रूवल रूट (Automatic Approval Route) के तहत मंजूरी दे दी। इससे ऐसे सौदों में लगने वाला समय और झंझट काफी कम हो गया। फिर, सितंबर 2024 में, मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (MCA) ने कंपनी रूल्स (Company Rules) में संशोधन किया। इससे विदेशी पैरेंट कंपनियां अपनी पूरी तरह से मालिकाना हक वाली भारतीय यूनिट्स का फास्ट-ट्रैक प्रोसेस (Fast-track Process - सेक्शन 233) के जरिए मर्जर कर सकती हैं। इससे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मंजूरी की जरूरत खत्म हो गई, जिससे मर्जर का सामान्य समय 8-12 महीनों से घटकर 90-120 दिन हो गया है। इन अपडेट्स से भारतीय स्टार्टअप्स के लिए 'फ्लिप बैक' (Flip back) करना सस्ता और तेज हुआ है, और भारतीय-विदेशी स्वामित्व वाली कंपनियों के बीच क्रॉस-बॉर्डर मर्जर भी ज्यादा प्रैक्टिकल हो गए हैं।

मिसालें और खतरे

2024 की शुरुआत में HomeLane और Design Cafe का ऑल-स्टॉक मर्जर एक अहम उदाहरण है, जिसकी कीमत करीब $400 मिलियन थी। इससे दोनों कंपनियों ने अपने ऑपरेशंस को मिलाकर कैटेगरी विस्तार, लीडरशिप को मजबूत करने और प्रॉफिट की ओर तेजी से बढ़ने का लक्ष्य रखा। Power2SME और Jiraaf का मर्जर भी एक उदाहरण है, जिसने एसेट क्रिएशन (Asset Creation) और डिस्ट्रीब्यूशन (Distribution) के लिए एक संयुक्त बिजनेस बनाया। Zomato द्वारा जून 2022 में Blinkit का $568 मिलियन में किया गया ऑल-स्टॉक अधिग्रहण (Acquisition) भी एक बड़ा पब्लिक उदाहरण है, जहां Blinkit अब Zomato का एक कीमती हिस्सा बन गया है। हालांकि, अगर मर्जर ठीक से न किए जाएं तो ये वैल्यू डिस्ट्रॉय (Value Destroy) भी कर सकते हैं। Byju's का अनुभव एक बड़ी चेतावनी है। कंपनी ने Aakash (करीब $950 मिलियन) और WhiteHat Jr ($300 मिलियन) जैसी कंपनियों को खरीदने में लगभग $2.5 बिलियन खर्च किए, लेकिन उसके बाद कंपनी का वैल्यूएशन (Valuation) गिर गया। यह दिखाता है कि एक्विजिशन (Acquisition) कोर समस्याओं वाले बिजनेस को ठीक नहीं कर सकते। आम गलतियों में ज्यादा भुगतान करना, संस्थापकों के बीच असहमति और खराब इंटीग्रेशन प्लानिंग (Integration Planning) शामिल हैं। सफल सौदों के लिए सावधानीपूर्वक योजना की आवश्यकता होती है, जिसमें उचित शेयर स्वैप रेशियो (Share Swap Ratio), संस्थापक समझौते (Founder Agreements) और विस्तृत इंटीग्रेशन स्ट्रेटेजी (Integration Strategy) शामिल हैं, जिन्हें अक्सर जल्दीबाजी में निपटाया जाता है।

वैल्यूएशन और डील में अड़चनें

फिलहाल कंसॉलिडेशन के मुख्य कारण खरीदारों की कमी और नई फंडिंग जुटाने में मुश्किल आना हैं, जिससे कई डील 'जरूरत का मर्जर' (Merger of Necessity) बन गई हैं। Mamaearth और Awfis जैसी कंपनियों के पब्लिक मार्केट वैल्यूएशन (Public Market Valuation) बताते हैं कि निवेशक स्केल (Scale) और मार्केट लीडरशिप (Market Leadership) को पसंद करते हैं। इस स्केल को हासिल करने के लिए अक्सर ऑर्गेनिक ग्रोथ (Organic Growth) की बजाय कंसॉलिडेशन की जरूरत पड़ती है। खतरा यह है कि छोटी कंपनियों के लिए ज्यादा भुगतान कर दिया जाए, जिससे अपेक्षित फायदे (Synergies) न मिलें या इंटीग्रेशन की समस्याएं वैल्यू कम कर दें। सफलता की कुंजी सौदे की स्ट्रक्चर (Deal's Structure) में है - जिसमें उचित एक्सचेंज रेट (Exchange Rate), संस्थापक समझौते और मजबूत इंटीग्रेशन प्लान शामिल हों, जिनकी अक्सर जल्दी में सौदे बंद करते समय उपेक्षा की जाती है।

आगे का रास्ता

अब एक बड़े मर्जर वेव (Merger Wave) के लिए माहौल तैयार है: बहुत सारी छोटी कंपनियां, कम रेगुलेटरी बाधाएं, पब्लिक मार्केट का स्केल को तरजीह देना और निवेशकों की बड़े, स्पष्ट एग्जिट की चाहत। आने वाले साल यह तय करेंगे कि भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम क्या विलय के रास्ते स्थायी ग्रोथ और सफल एग्जिट हासिल कर पाता है या नहीं। यह कंसॉलिडेशन ट्रेंड काफी हद तक संस्थापकों और निवेशकों द्वारा अच्छी तरह से नियोजित विलय को एक मुख्य रणनीति के रूप में अपनाने पर निर्भर करेगा।

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