स्टार्टअप डील्स में तेजी, फंडिंग का रास्ता हुआ आसान
भारत का तेजी से उभरता स्टार्टअप सेक्टर इस समय एक बड़ी अड़चन का सामना कर रहा था। कम्पीटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) के नियमों के तहत, बड़ी डील्स के लिए प्री-डील अप्रूवल लेना पड़ता है। यह प्रॉसेस, जो आमतौर पर 2 से 3 महीने तक चलता है, अक्सर निवेशकों को जरूरी अधिकार जैसे बोर्ड सीट या वोटिंग पावर छोड़ने पर मजबूर करता था, सिर्फ इसलिए ताकि फंडिंग जल्दी मिल सके। इस 'इंटर-कनेक्शन' प्रिंसिपल के चलते, एक डील के सभी जुड़े हुए स्टेप्स को एक साथ फाइल करना पड़ता था।
'इंटर-कनेक्शन' नियम में मिली राहत
इस समस्या का समाधान करते हुए, सरकार ने प्रस्ताव दिया है कि 'इंटर-कनेक्शन' नियम को उन डील्स के लिए अस्थायी रूप से अलग रखा जाएगा, जहाँ कोई फाइनेंशियल इन्वेस्टर किसी एक कंपनी में हिस्सेदारी खरीद रहा हो। इससे निवेशक डील के उन हिस्सों को तुरंत पूरा कर सकेंगे, जिन पर CCI की मंजूरी की तुरंत जरूरत नहीं है, जबकि बाकी हिस्से पर मंजूरी का इंतजार किया जा सकेगा। इसका मकसद CCI की प्रतिस्पर्धा संबंधी जांच की क्षमता को कमजोर किए बिना, फंडिंग की गति बढ़ाना है।
ग्लोबल रूल्स के साथ तालमेल और भारत की कोशिशें
भारत इस मामले में ग्लोबल ट्रेंड्स को अपना रहा है, क्योंकि ऐसे नियम EU और UK जैसे देशों में भी देखे जाते हैं। भारत ने हाल ही में कम्पीटीशन लॉ में डील वैल्यू थ्रेशोल्ड (DVT) और कम रिव्यू टाइम जैसे उपाय शामिल किए हैं। 2023 और 2024 के नए नियमों के तहत, INR 20 अरब (लगभग $240 मिलियन) से ऊपर की उन डील्स के लिए नोटिफिकेशन की जरूरत है, जहाँ टारगेट कंपनी के भारत में महत्वपूर्ण ऑपरेशन हों। सरकार डिजिटल कंपनियों पर विशेष ध्यान दे रही है। खासकर तब, जब 2024 में PE-VC निवेश लगभग $43 बिलियन तक पहुंचा, वहीं 2025 की पहली छमाही में लेट-स्टेज फंडिंग में 27% की गिरावट देखी गई, जो कैपिटल की तेज जरूरत को दर्शाता है।
तेजी के साथ जोखिमों का संतुलन
हालांकि, इस प्रस्ताव के कुछ जोखिम भी हैं। रेगुलेटर्स को चिंता है कि कहीं इससे CCI को डील के पूरे प्रभाव की तस्वीर न धुंधली हो जाए। हो सकता है कि चतुर निवेशक इन अलग-अलग मंजूरियों का फायदा उठाएं, जिससे प्रवर्तन (enforcement) में मुश्किलें आ सकती हैं। नियमों के उल्लंघन पर 1% तक का जुर्माना लग सकता है। इसलिए, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि तेजी से फंडिंग के साथ-साथ मजबूत रेगुलेटरी जांच और कंपनी ओवरसाइट बनी रहे। यह कदम भारत को निवेश के लिए और आकर्षक बना सकता है।
