IIT Roorkee और IvyCap की नई पहल: ₹1,000 करोड़ का डीप-टेक एंडॉवमेंट फंड लॉन्च

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AuthorAditya Rao|Published at:
IIT Roorkee और IvyCap की नई पहल: ₹1,000 करोड़ का डीप-टेक एंडॉवमेंट फंड लॉन्च

IIT Roorkee ने IvyCap Ventures और NuQuant के साथ मिलकर 'भारत इनोवेट्स' (Bharat Innovates) पहल के तहत ₹1,000 करोड़ का 'सुपर एंडॉवमेंट फंड' लॉन्च किया है। इस फंड का लक्ष्य डीप-टेक स्टार्टअप्स को पारंपरिक वेंचर कैपिटल के शॉर्ट-टर्म दबावों से हटकर, लॉन्ग-टर्म, परपेचुअल कैपिटल प्रदान करना है। यह मॉडल भारत में अकादमिक रिसर्च और कमर्शियल स्केलेबिलिटी के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करेगा।

क्या हुआ है?

IIT Roorkee ने IvyCap Ventures और NuQuant के साथ मिलकर एक बड़ा फाइनेंशियल इनिशिएटिव लॉन्च किया है: ₹1,000 करोड़ का 'सुपर एंडॉवमेंट फंड'। 'भारत इनोवेट्स' प्रोग्राम के तहत, यह फंड IIT नेटवर्क में डीप-टेक स्टार्टअप्स को सपोर्ट करने के लिए बनाया गया है। एक स्टैंडर्ड वेंचर कैपिटल फंड के विपरीत, जो एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 7-10 साल) के लिए चलता है, यह एंडॉवमेंट मॉडल परपेचुअल यानी स्थायी रहने के लिए स्ट्रक्चर्ड है। इसका मतलब है कि कैपिटल को लंबे समय तक इन्वेस्टेड रखने और ग्रो करने का इरादा है, जिससे रिसर्च और एंटरप्रेन्योरशिप के लिए पैसों का एक सेल्फ-सस्टेनिंग पूल मिल सके।

इनोवेशन इकोसिस्टम के लिए इसका महत्व

भारतीय स्टार्टअप की दुनिया में, ज्यादातर वेंचर कैपिटल फंड्स को तेज ग्रोथ और एग्जिट्स का पीछा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। हालाँकि, डीप-टेक एक अलग तरह का क्षेत्र है। इस सेक्टर के स्टार्टअप्स - जिनमें अक्सर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, मैटेरियल्स साइंस या कॉम्प्लेक्स बायोटेक शामिल होते हैं - को कमर्शियल प्रोडक्ट बनाने से पहले सालों के गहन रिसर्च और डेवलपमेंट की आवश्यकता होती है।

इन लंबी टाइमलाइन के कारण, कई डीप-टेक फर्म्स को ऐसे निवेशकों को खोजने में मुश्किल होती है जो इतने लंबे समय तक इंतजार करने को तैयार हों। एंडॉवमेंट बनाकर, पार्टनर्स का लक्ष्य एक 'कंपाउंडिंग इंजन' प्रदान करना है जो इन व्यवसायों को उनकी शुरुआती रिसर्च के दिनों से लेकर स्केलिंग तक सपोर्ट करे, बिना फंड की मैच्योरिटी डेट के दबाव के।

बिज़नेस की असलियत

एंडॉवमेंट फंड की अवधारणा शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन यह चुनौतियों से रहित नहीं है। डीप-टेक इन्वेस्टिंग स्वाभाविक रूप से हाई-रिस्क वाली होती है। रिसर्च-हेवी स्टार्टअप्स की एक महत्वपूर्ण संख्या अकादमिक सफलताओं को वायबल, प्रॉफिटेबल बिजनेस में बदलने में विफल रहती है। इस फंड की सफलता काफी हद तक मैनेजर्स द्वारा उपयोग की जाने वाली सिलेक्शन प्रोसेस पर निर्भर करेगी ताकि ऐसे स्टार्टअप्स को चुना जा सके जिनमें केवल अकादमिक रुचि के बजाय वास्तविक मार्केट पोटेंशियल हो।

इसके अलावा, फंड की 'परपेचुअल' प्रकृति एलुमनी, कॉर्पोरेट डोनर्स और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स से लगातार कंट्रीब्यूशन पर निर्भर करती है। एक पारंपरिक फंड के विपरीत जहां निवेशक शुरुआत में पैसा लगाते हैं, इस मॉडल में कॉर्पस को ग्रोइंग रखने के लिए लगातार एंगेजमेंट की आवश्यकता होती है। IvyCap Ventures, जिसके पास एंडॉवमेंट स्पेस में अनुभव है, इन एसेट्स के मैनेजमेंट के लिए जिम्मेदार होगा। टीम की इस स्ट्रेटेजी को एक्जीक्यूट करने की क्षमता, फंड की लिक्विडिटी को बनाए रखते हुए, समय के साथ परखी जाएगी।

आगे क्या देखना है

इस स्पेस को फॉलो करने वालों के लिए, मुख्य अपडेट कैपिटल का वास्तविक डिप्लॉयमेंट और उन स्टार्टअप्स की संरचना होगी जिन्हें फंडिंग मिलेगी। इन्वेस्टर्स और इंडस्ट्री ऑब्जर्वर्स को इन बातों पर नज़र रखनी चाहिए:

  1. फंडरेज़िंग की प्रगति: पार्टनर्स कितनी जल्दी एलुमनी और बाहरी डोनर्स से ₹1,000 करोड़ के टारगेट तक पहुँच सकते हैं?
  2. इन्वेस्टमेंट क्राइटेरिया: फंड डीप-टेक के हाई रिस्क को एंडॉवमेंट कॉर्पस को संरक्षित करने की आवश्यकता के साथ कैसे संतुलित करेगा?
  3. सफलता दर: अगले कुछ वर्षों में, यह मॉनिटर करें कि चयनित स्टार्टअप्स कमर्शियल माइलस्टोन तक पहुँच रहे हैं या वे रिसर्च फेज में अटके हुए हैं।

यह पहल टॉप भारतीय संस्थानों द्वारा कैंपस-बॉर्न आइडियाज के लिए सपोर्ट को औपचारिक बनाने के प्रयासों में एक बदलाव का प्रतीक है, जो संभावित रूप से अन्य विश्वविद्यालयों के लिए एक टेम्पलेट बना सकता है।

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