बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) ने भारत के ₹1 ट्रिलियन RDI इनिशिएटिव के तहत बायोटेक स्टार्टअप्स के पहले बैच को चुना है। Fermbox Bio की फर्मेंटेशन फैसिलिटी और Sea6 Energy के सीवीड प्रोडक्शन जैसे प्रोजेक्ट्स को लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए फंड मिलेगा। इस कदम का मकसद सिंथेटिक बायोलॉजी और बायोफ्यूल्स में कमर्शियल-स्केल रिसर्च को सपोर्ट करके इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना है।
RDI फंड के तहत पहली बार मिली फंडिंग
बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) ने घरेलू बायोटेक कंपनियों के लिए फंडिंग की पहली किश्त जारी कर दी है। यह सरकार के विशाल ₹1 ट्रिलियन रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) फंड का हिस्सा है, जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और बायोटेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर्स में इंडस्ट्रियल-ग्रेड इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
इन स्टार्टअप्स को मिली मदद
शुरुआती फंडिंग में Fermbox Bio, Sea6 Energy, Revelations Biotech, 4baseCare और Telluris Biotech जैसी कंपनियां शामिल हैं। Fermbox Bio, Revelations Biotech और Sea6 Energy के लिए लगभग ₹450 करोड़ की वित्तीय प्रतिबद्धताएँ हुई हैं। सरकार आमतौर पर प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत का 50% तक प्रदान करती है, जिससे कंपनियों को बाकी फंड खुद जुटाना पड़ता है। यह ढांचा सुनिश्चित करता है कि केवल उन्हीं प्रोजेक्ट्स को सपोर्ट मिले जिनकी कमर्शियल व्यवहार्यता स्पष्ट हो।
बेंगलुरु स्थित Fermbox Bio अपने फंड का उपयोग बड़े पैमाने पर प्रिसिजन फर्मेंटेशन फैसिलिटी बनाने के लिए करेगी। प्रोजेक्ट का फोकस सेल्युलोसिक एंजाइम और एक्टिव ड्राइड डिस्टिलर्स यीस्ट का उत्पादन करना है। इन कंपोनेंट्स को घरेलू स्तर पर विकसित करके, कंपनी का इरादा बायोफ्यूल सेक्टर के लिए इंपोर्टेड मटेरियल पर देश की निर्भरता कम करना है। इसी तरह, Sea6 Energy अपने सीवीड फीडस्टॉक प्रोडक्शन को बढ़ा रही है, जबकि हैदराबाद स्थित Revelations Biotech बड़े पैमाने पर विटामिन MK-7 बनाने के लिए सिंथेटिक बायोलॉजी तकनीकों पर काम कर रही है।
RDI फंड कैसे काम करता है?
RDI फंड विशेष प्रबंधकों के माध्यम से काम करता है, जिसमें BIRAC और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) बायोटेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल टेक सेगमेंट को संभालते हैं। BIRAC इन प्रोजेक्ट्स को शुरू करने के लिए अनुसन्धान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन से ₹2,000 करोड़ का प्रारंभिक आवंटन प्राप्त कर रहा है। योग्य होने के लिए, कंपनियों का मुख्यालय भारत में होना चाहिए, उनका मालिकाना हक घरेलू होना चाहिए, और यह प्रदर्शित करना होगा कि उनके रिसर्च ने टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल (TRL) 4 या उससे ऊपर का स्तर प्राप्त कर लिया है, जिसका मतलब है कि टेक्नोलॉजी को लैब में मान्य किया जा चुका है।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
निवेशकों के लिए, ये फंडिंग पहल लाइफ साइंसेज सेक्टर में इंपोर्ट को घरेलू उत्पादन से बदलने के सरकारी प्रयास का संकेत देती हैं। प्रोजेक्ट लागत का आधा हिस्सा प्राइवेट कैपिटल पर निर्भर करता है, जिससे यह उम्मीद की जाती है कि ये कंपनियां वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक व्यवहार्यता दिखाएंगी। आगे सबसे महत्वपूर्ण कदम यह देखना होगा कि ये कंपनियां रिसर्च एंड डेवलपमेंट से फुल-स्केल कमर्शियल मैन्युफैक्चरिंग में कब तक ट्रांजिशन करती हैं। निवेशक इन प्रोजेक्ट्स के प्रोडक्शन माइलस्टोन को भी ट्रैक कर सकते हैं, क्योंकि इन फैसिलिटीज को चालू करने या स्केल करने में देरी से सरकार और फर्मों दोनों द्वारा निवेश की गई पूंजी पर अपेक्षित रिटर्न प्रभावित हो सकता है।
