VC Exits in New-Age Firms: ₹67,170 करोड़ की बिकवाली से मचा घमासान, Governance पर उठे सवाल

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AuthorMehul Desai|Published at:
VC Exits in New-Age Firms: ₹67,170 करोड़ की बिकवाली से मचा घमासान, Governance पर उठे सवाल

सितंबर 2026 तक वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी फर्मों ने नई लिस्टेड कंपनियों में **₹67,170 करोड़** से अधिक के शेयर बेच दिए हैं। इस बड़ी निकासी के बाद अब म्यूचुअल फंड मैनेजरों और शुरुआती निवेशकों के बीच कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर बहस छिड़ गई है।

भारतीय बाजार में मालिकाना हक का एक बड़ा दौर बदल रहा है। नई लिस्टेड कंपनियों से शुरुआती निवेशकों का बाहर निकलना अब एक चर्चा का विषय बन गया है। साल 2026 के मध्य सितंबर तक, नई पीढ़ी की कंपनियों में सेकेंडरी मार्केट ट्रांजैक्शन का आंकड़ा ₹67,170 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें से अधिकांश बिकवाली केवल 5 महीनों के भीतर हुई है। यह भारतीय स्टार्टअप्स के शुरुआती समर्थकों के लिए एक लंबे इन्वेस्टमेंट साइकिल के अंत का संकेत है।

गवर्नेंस पर छिड़ी जंग

इस मास एग्जिट (Mass Exit) ने म्यूचुअल फंड और वेंचर कैपिटल फर्मों के बीच गवर्नेंस को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है। ICICI Prudential AMC के CIO, एस. नरेन ने चिंता जताई है कि जब फाउंडर्स और वेंचर फर्म बोर्ड से हट जाएंगी, तो कंपनियों पर नजर कौन रखेगा? पारंपरिक पारिवारिक कंपनियों के उलट, नई उम्र की कंपनियों में अक्सर प्रमोटर्स जैसा कोई मजबूत 'लॉन्ग-टर्म एंकर' नहीं होता, जिससे ये कंपनियां पूरी तरह बाहरी बोर्ड सदस्यों पर निर्भर हो जाती हैं।

म्यूचुअल फंड मैनेजरों का तर्क है कि अब जिम्मेदारी स्वतंत्र निदेशकों (Independent Directors) और पब्लिक शेयरहोल्डर्स पर आ गई है। अगर फाउंडर्स के पास अपने पुराने समर्थकों का साथ नहीं है, तो बोर्ड को निवेशकों के हित सुरक्षित करने के लिए पारंपरिक प्रमोटर्स की तरह जिम्मेदारी निभानी होगी।

वेंचर कैपिटल का पक्ष

Accel, Elevation Capital और Lightspeed India जैसी बड़ी फर्मों का कहना है कि वेंचर कैपिटल का काम ही लंबे समय तक निवेश करना है, जो अक्सर 13 साल तक चलता है। उनके लिए IPO ही उनके निवेश सफर का अंत होता है, न कि बीच में छोड़कर भागना। उनका तर्क है कि इतने वर्षों तक कंपनी को खड़ा करने के बाद, अब इसकी जिम्मेदारी पब्लिक मार्केट के निवेशकों और स्वतंत्र निदेशकों की है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

रिटेल निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि अब इन कंपनियों का मैनेजमेंट बदल रहा है। अब फोकस कंपनी के 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' की क्वालिटी पर होना चाहिए। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि स्वतंत्र निदेशक अपनी जिम्मेदारियां कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं। मजबूत इंटरनल कंट्रोल और एथिकल स्टैंडर्ड्स ही आने वाली तिमाही में यह तय करेंगे कि बिना पुराने बैकर्स के ये कंपनियां ग्रोथ और रिस्क को कैसे हैंडल करती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.