अमेरिका में डिजिटल एसेट रूल्स तय करने वाला 'Clarity Act' सीनेट में अटक गया है। इस बिल के फेल होने के पीछे प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप की **$1.4 अरब** की क्रिप्टो-लिंक्ड इनकम से जुड़े विवाद मुख्य वजह बने हैं, जिससे अब क्रिप्टो कंपनियों के लिए रेगुलेटरी अनिश्चितता बढ़ गई है।
अमेरिका के डिजिटल एसेट सेक्टर को इस हफ्ते एक बड़ा झटका लगा है। क्रिप्टो के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने वाला 'Clarity Act' सीनेट में गिर गया है। इस बिल के पीछे का राजनीतिक ड्रामा प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप की क्रिप्टो इंडस्ट्री से जुड़ी निजी फाइनेंशियल डील्स पर आकर केंद्रित हो गया। इंडस्ट्री को उम्मीद थी कि यह कानून Securities and Exchange Commission (SEC) और Commodity Futures Trading Commission (CFTC) के बीच भूमिकाओं को साफ करेगा, लेकिन बहस मार्केट स्ट्रक्चर के बजाय एथिक्स पर शिफ्ट हो गई।
एथिक्स और लेजिस्लेटिव डेडलॉक
बिल के फेल होने की बड़ी वजह प्रेसिडेंट की $1.4 अरब की क्रिप्टो-लिंक्ड कमाई है, जो मुख्य रूप से 'World Liberty Financial' जैसे वेंचर्स से जुड़ी है। सीनेटर Elizabeth Warren समेत विपक्ष ने तर्क दिया कि इस बिल को समर्थन देना हितों के टकराव (Conflict of Interest) को बढ़ावा देना हो सकता है। रिपब्लिकन लीडरशिप ने निर्वाचित अधिकारियों के लिए क्रिप्टो होल्डिंग्स के डिस्क्लोजर क्लॉज जोड़ने की कोशिश भी की, लेकिन वह पर्याप्त समर्थन जुटाने में नाकाम रहे।
फाइनेंशियल रेगुलेशन में टकराव
एथिकल चिंताओं के अलावा, ट्रेडिशनल बैंकिंग सेक्टर ने भी इस बिल का पुरजोर विरोध किया। बैंकों को डर था कि बिल में 'स्टेबलकॉइन यील्ड' (Stablecoin yields) जैसे प्रोविजन्स से उनके पास जमा पैसा बाहर निकल सकता है, जो बैंकिंग स्टेबिलिटी को नुकसान पहुँचा सकता है। इसके अलावा, डिसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस (DeFi) कम्युनिटी और डेवलपर्स की जरूरतों को लेकर भी नीतिगत विवाद बने रहे, जिससे इंडस्ट्री एक मंच पर नहीं आ पाई।
रेगुलेटरी अनिश्चितता और आगे का रास्ता
अब यह बिल फिलहाल ठंडे बस्ते में है और अमेरिकी क्रिप्टो इंडस्ट्री एक मुश्किल स्थिति में है। अब सारा फोकस फिर से फेडरल रेगुलेटर्स पर आ गया है, जो बिना कानून के ही प्रशासनिक नियमों से काम चला रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, SEC ने अब 'टोकनाइज्ड स्टॉक ट्रेडिंग' (Tokenized stock trading) के लिए एडमिनिस्ट्रेटिव रास्ते अपनाना शुरू कर दिया है। निवेशकों को ध्यान देना होगा कि अब नीतियां संसद से कानून के जरिए नहीं, बल्कि एजेंसी के निर्देशों और कोर्ट के फैसलों से तय होंगी। 'Fairshake' जैसे PACs के जरिए लॉबिंग जारी रहने के संकेत हैं, जिससे साफ है कि भले ही यह विधायी प्रयास विफल रहा हो, लेकिन नीतिगत बदलावों की जंग अभी जारी रहेगी।
