Tata Trusts के ट्रस्टी Darius Khambata ने अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा नियुक्ति न लेने का फैसला किया है। यह फैसला N. Chandrasekaran को फिर से Chairman बनाने के बोर्ड प्रस्ताव पर हुए आंतरिक विवाद के बाद आया है।
विवाद की जड़
Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के प्रमुख ट्रस्टी Darius Khambata का कार्यकाल 8 नवंबर, 2026 को समाप्त हो रहा है। उनके बाहर निकलने के फैसले के पीछे 17 सितंबर, 2026 को हुई बोर्ड मीटिंग है, जिसमें N. Chandrasekaran को Tata Sons के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के रूप में तीसरी बार नियुक्त करने का प्रस्ताव लाया गया था।
Noel Tata ने भी उठाए सवाल
यह विवाद सिर्फ Khambata तक सीमित नहीं है। Noel Tata ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया था और बोर्ड की कार्यवाही में पारदर्शिता और गवर्नेंस प्रक्रियाओं के पालन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आधिकारिक बोर्ड रिकॉर्ड्स तक पहुंच की भी मांग की है, जिससे ग्रुप के शीर्ष स्तर पर मची खींचतान साफ नजर आ रही है।
निवेशकों पर असर
भले ही Tata Sons एक प्राइवेट कंपनी है, लेकिन यह Tata Consultancy Services, Tata Motors और Tata Steel जैसी 26 लिस्टेड कंपनियों की प्रमोटर है। प्रमोटर स्तर पर गवर्नेंस में अस्थिरता का असर इन सब्सिडियरी कंपनियों के निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ सकता है।
RBI की चुनौती
एक Core Investment Company होने के नाते, Reserve Bank of India (RBI) ने Tata Sons को शेयर बाजार में लिस्ट होने का निर्देश दिया है। ग्रुप की लीडरशिप अभी इस रेगुलेटरी अनिवार्यता और ट्रस्ट के नियंत्रण को बनाए रखने की इच्छा के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश कर रही है। अब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह आंतरिक कलह सुलझ पाएगी या आने वाले समय में टाटा ग्रुप की रणनीतिक दिशा में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
