Tata Trusts ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास **84** कैविएट दाखिल की हैं। यह कदम ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह की शिकायतों के बाद उठाया गया है। विवाद की जड़ Tata Sons की संभावित लिस्टिंग है, जिसका ट्रस्ट विरोध कर रहा है।
Tata Trusts में चल रहा अंदरूनी गवर्नेंस विवाद अब एक अहम मोड़ पर है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) ने अपनी स्थिति को कानूनी रूप से सुरक्षित करने के लिए महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास 84 कैविएट दायर की हैं। इसका उद्देश्य किसी भी अंतरिम आदेश से पहले अपना पक्ष मजबूती से रखना है। यह कानूनी कार्रवाई ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह की उन शिकायतों के बाद आई है, जिसमें उन्होंने बोर्ड के फैसलों और मैनेजमेंट स्टाइल पर सवाल उठाए थे।
विवाद की मुख्य वजह क्या है?
इस खींचतान का केंद्र Tata Sons की भविष्य की रणनीति है। RBI के नियमों के अनुसार, Tata Sons को 'अपर-लेयर' NBFC माना जाता है, जिसके तहत कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य हो सकता है। चेयरमैन नोएल टाटा के नेतृत्व में Tata Trusts इस लिस्टिंग के खिलाफ हैं। ट्रस्ट का मानना है कि टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स जैसी कंपनियों का विलय करके वे लिस्टिंग की जरूरत को पूरा कर सकते हैं।
बोर्ड में दो फाड़
जहां वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह का आरोप है कि ट्रस्ट बोर्ड कमर्शियल मामलों में दखल दे रहा है, वहीं चेयरमैन नोएल टाटा और अन्य ट्रस्टी जैसे डेरियस खंबाटा, नेविल टाटा और भास्कर भट ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका तर्क है कि शिकायत करने वाले ट्रस्टी अपनी जिम्मेदारी का उल्लंघन कर रहे हैं और बोर्ड के उन फैसलों के खिलाफ बोल रहे हैं जिन पर वे खुद पहले सहमति दे चुके थे।
निवेशकों के लिहाज से यह स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि Tata Sons पूरे टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है। अब चैरिटी कमिश्नर ने ट्रस्ट को 12 अक्टूबर 2026 तक इन आरोपों का औपचारिक जवाब देने का निर्देश दिया है। बाजार की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बोर्ड बिना किसी बड़े रेगुलेटरी दबाव के इस कलह को सुलझा पाएगा।
