Tata Sons ने एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) को चेयरमैन के पद पर फिर से नियुक्त करने का फैसला बरकरार रखा है। कंपनी ने Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) के विरोध को खारिज करते हुए इसे कानूनी रूप से सही ठहराया है।
Tata Sons ने एन. चंद्रशेखरन को 5 साल के तीसरे कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त करने के अपने फैसले पर अडिग रहने का निर्णय लिया है। इस कदम को सही साबित करने के लिए बोर्ड ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित (Uday U. Lalit) और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी.एन. कृष्णा (B.N. Krishna) से औपचारिक कानूनी राय ली, जिन्होंने बोर्ड की प्रक्रिया को कंपनी के नियमों के अनुरूप माना है।
विवाद की जड़: टाई-ब्रेकिंग वोट
विवाद की शुरुआत सितंबर में हुई बोर्ड मीटिंग से हुई थी, जहाँ एन. चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर नोएल टाटा ने असहमति जताई थी, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने समर्थन दिया। अंत में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर हरीश मनवानी ने 'टाई-ब्रेकिंग वोट' (Tie-breaking vote) का इस्तेमाल कर नियुक्ति को फाइनल किया। कानूनी राय में स्पष्ट किया गया है कि निदेशकों की प्राथमिक जिम्मेदारी ट्रस्ट की इच्छा के बजाय कंपनी के सर्वोत्तम हित में काम करना है।
नियुक्ति प्रक्रिया पर भ्रम
नोएल टाटा के खेमे ने तर्क दिया था कि इस प्रक्रिया के लिए 5 सदस्यीय समिति की आवश्यकता थी। हालांकि, कंपनी ने स्पष्ट किया कि यह नियम केवल नए लीडर को चुनने पर लागू होता है, जबकि चंद्रशेखरन का कार्यकाल अभी फरवरी 2027 तक बाकी है और यह पुनर्नियुक्ति 2022 की प्रक्रिया के अनुरूप है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
Tata Sons पूरे Tata Group की होल्डिंग कंपनी है, जिसके तहत TCS, Tata Motors और Tata Steel जैसी दिग्गज कंपनियां आती हैं। Tata Trusts के पास कंपनी की 66% हिस्सेदारी है। बाजार के जानकारों का मानना है कि होल्डिंग कंपनी में इस तरह का गवर्नेंस विवाद ग्रुप की रणनीतिक दिशा पर असर डाल सकता है, इसलिए लंबे समय के नजरिए से निवेशकों की इस पर पैनी नजर बनी रहेगी।
