Tata Sons ने अपनी दो सहायक कंपनियों के मर्जर का प्रस्ताव रखा है। इस कदम का मकसद 'अपर-लेयर NBFC' का टैग हटाकर RBI के अनिवार्य लिस्टिंग नियमों से बचना है। इससे बाजार में IPO की उम्मीदों को झटका लगा है और टाटा ग्रुप के शेयरों में बिकवाली देखी गई है।
टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी Tata Sons ने अनिवार्य पब्लिक लिस्टिंग से बचने के लिए एक नई रणनीतिक योजना पर काम शुरू कर दिया है। टाटा ट्रस्ट्स से मिले प्रस्ताव के तहत Tata Electronics Systems और Tata Consulting Engineers को सीधे पैरेंट कंपनी में विलय करने की योजना है। इस पुनर्गठन (Restructuring) का मुख्य उद्देश्य कंपनी को एक निवेश इकाई से बदलकर एक 'ऑपरेटिंग एंटिटी' के रूप में पेश करना है।
लिस्टिंग नियमों से बचने की कोशिश
मामला RBI के 2022 के उस रेगुलेशन का है, जिसमें Tata Sons को 'अपर-लेयर NBFC' के रूप में वर्गीकृत किया गया था। नियमों के अनुसार, इस श्रेणी की कंपनियों को 3 साल के भीतर स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होना अनिवार्य है। बाजार में लंबे समय से Tata Sons के IPO को लेकर कयास लगाए जा रहे थे, जो अब ठंडे पड़ते दिख रहे हैं।
ग्रुप की योजना है कि ऑपरेटिंग व्यवसायों के विलय के बाद, कंपनी का अधिकांश रेवेन्यू नॉन-फाइनेंशियल होगा। प्रस्तावित योजना के मुताबिक, नई इकाई का संयुक्त ऑपरेटिंग रेवेन्यू लगभग ₹1.05 लाख करोड़ रहने का अनुमान है, जिससे इसे 'नॉन-बैंकिंग, नॉन-फाइनेंशियल कंपनी' का दर्जा मिलने की उम्मीद है।
बाजार का रुख और रेगुलेटरी रिस्क
इस खबर के बाद Tata Chemicals, Tata Motors Passenger Vehicles और Tata Investment Corporation जैसे शेयरों में 2.2% से लेकर 3% तक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशक अब तक इस होल्डिंग कंपनी की लिस्टिंग से वैल्यू अनलॉकिंग की उम्मीद लगाए बैठे थे।
हालाँकि, आगे की राह आसान नहीं है। RBI पहले भी ग्रुप की वॉलंटरी डी-रजिस्ट्रेशन की मांग को खारिज कर चुका है। अब पूरा दारोमदार Tata Sons के बोर्ड की मंजूरी और केंद्रीय बैंक (RBI) के अंतिम फैसले पर टिका है। देखना यह होगा कि क्या ग्रुप रेगुलेटर्स को यह समझाने में कामयाब हो पाता है कि यह एक ऑपरेटिंग कंपनी है न कि कोई निवेश वाहन।
