Tata Sons में इंटरनल कलह बढ़ गई है। बोर्ड ने N. Chandrasekaran को चेयरमैन के तौर पर फिर से नियुक्त करने का फैसला लिया है, लेकिन Tata Trusts के नॉमिनीज़ के बीच मतभेद होने के कारण अब इस प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
विवाद की जड़: वोटिंग और प्रोसीजर
17 सितंबर, 2026 को हुई बोर्ड मीटिंग में 4:1 के अंतर से N. Chandrasekaran को चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव पास किया गया। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया पर अब सवाल उठ रहे हैं। सारा विवाद कंपनी के आर्टिकल 121 को लेकर है, जो Tata Trusts को बड़ी नियुक्तियों में निर्णायक अधिकार देता है।
बोर्ड में शामिल Venu Srinivasan ने नियुक्ति का समर्थन किया, जबकि Noel Tata ने इसके खिलाफ वोट दिया। ट्रस्ट के नॉमिनीज़ के बीच इस मतभेद का मतलब था कि प्रस्ताव के लिए जरूरी 'सर्वसम्मति' नहीं बन पाई।
कास्टिंग वोट का दांव
मीटिंग की अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति ने अपने 'कास्टिंग वोट' का इस्तेमाल करके इस नियुक्ति को फाइनल कर दिया। आलोचकों का कहना है कि कास्टिंग वोट का इस्तेमाल आमतौर पर तब होता है जब वोटिंग बराबर (tie) हो जाए, न कि किसी असहमति को दबाने के लिए। अब कानूनी जानकारों के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या यह तरीका कंपनी के नियमों का उल्लंघन है या नहीं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
Tata Sons ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है, जिसके तहत TCS, Tata Motors और Tata Steel जैसी दिग्गज कंपनियां आती हैं। ऐसे में टॉप लेवल पर कोई भी प्रशासनिक अस्थिरता ग्रुप की लॉन्ग-टर्म प्लानिंग और मार्केट सेंटीमेंट को प्रभावित कर सकती है।
N. Chandrasekaran पहले ही फरवरी 2027 में पद छोड़ने के संकेत दे चुके थे, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने उत्तराधिकार (succession) की स्थिति को और उलझा दिया है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या यह विवाद कानूनी मोड़ लेगा या कंपनी इसे बिना किसी बड़े बवाल के सुलझा लेगी।
