RBI ने Tata Sons की 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' स्टेटस छोड़ने की मांग को खारिज कर दिया है। इसके बाद कंपनी अब एक 'अपर-लेयर' NBFC बनी रहेगी, जिससे उसे अनिवार्य रूप से शेयर बाजार में लिस्ट होना होगा। इस घटनाक्रम के बीच आज कंपनी के बोर्ड की महत्वपूर्ण बैठक हो रही है।
RBI के इस कड़े रुख के बाद Tata Sons पर अब पब्लिक लिस्टिंग की तलवार लटक गई है। चूंकि कंपनी को अब 'अपर-लेयर' नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, नियमों के मुताबिक इसे शेयर बाजार में उतरना ही होगा। यह फैसला भारत के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप्स में से एक के कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को पूरी तरह बदल सकता है।
चेयरमैन के भविष्य पर सस्पेंस
बोर्ड बैठक में सबसे बड़ा मुद्दा चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) का भविष्य है। उनका वर्तमान कार्यकाल 20 फरवरी, 2027 को समाप्त हो रहा है और उन्होंने पहले ही पद छोड़ने के संकेत दिए थे। हालांकि, बोर्ड के कुछ सदस्य उन्हें बने रहने के लिए मना रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि कंपनी की लिस्टिंग जैसी जटिल प्रक्रिया को संभालने के लिए उनके अनुभव की जरूरत है। बोर्ड अब यह तय करेगा कि क्या उन्हें एक्सटेंशन दिया जाए या नेतृत्व परिवर्तन की ओर बढ़ा जाए।
कानूनी और रेगुलेटरी चुनौती
RBI ने न केवल अर्जी खारिज की है, बल्कि बॉम्बे हाई कोर्ट में कैविएट (Caveat) भी फाइल कर दी है, जिससे साफ है कि अगर कंपनी कानूनी रास्ता अपनाती है, तो रेगुलेटर पूरी तैयारी के साथ खड़ा है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
Tata Trusts, जिसकी अगुवाई नोएल टाटा (Noel Tata) कर रहे हैं, के पास कंपनी की करीब 66% हिस्सेदारी है। इस फैसले का असर पूरे टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों पर पड़ सकता है। निवेशक अब आधिकारिक बयान का इंतजार कर रहे हैं कि ग्रुप इस लिस्टिंग की अनिवार्यता को स्वीकार करेगा, कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा, या कोई और स्ट्रक्चरल समाधान ढूंढेगा। बाजार की नजरें इस पर टिकी हैं कि बोर्ड की रणनीति टाटा ग्रुप के भविष्य के लिए क्या दिशा तय करती है।
