TRAI का नया फरमान: इंटरनेट लीनियर टीवी के लिए लाइसेंस जरूरी, स्ट्रीमिंग कंपनियों पर बढ़ेगा बोझ

SEBIEXCHANGE
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
TRAI का नया फरमान: इंटरनेट लीनियर टीवी के लिए लाइसेंस जरूरी, स्ट्रीमिंग कंपनियों पर बढ़ेगा बोझ

Telecom Regulatory Authority of India (TRAI) ने इंटरनेट-आधारित लीनियर टेलीविजन चैनलों के लिए एक नए लाइसेंसिंग ढांचे का प्रस्ताव दिया है। इस बदलाव से स्ट्रीमिंग एग्रीगेटर्स अब टेलीकॉम रेगुलेशंस के दायरे में आ सकते हैं, जिससे कंपनियों की अनुपालन लागत (Compliance Cost) बढ़ने की आशंका है।

TRAI ने 'एप्लीकेशन-बेस्ड लीनियर टेलीविजन डिस्ट्रीब्यूशन' (ALTD) सेवाओं के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस प्रस्ताव के तहत इंटरनेट प्रोटोकॉल के जरिए चलने वाले लीनियर चैनलों को 'टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट, 2023' के तहत एक टेलीकॉम सर्विस माना जा सकता है। यह फैसला डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के रेगुलेशन में एक बड़ा बदलाव ला सकता है, जो अब तक पारंपरिक टेलीकॉम ऑपरेटर्स से अलग नियमों के तहत काम करते थे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पड़ेगा असर

'फ्री एड-सपोर्टेड स्ट्रीमिंग टेलीविजन' (FAST) मार्केट मीडिया कंपनियों के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया बनता जा रहा है, जिसका रेवेन्यू 2027 तक ₹960 करोड़ के पार जाने का अनुमान है। अभी तक ये सेवाएं पारंपरिक केबल या DTH के मुकाबले कम रेगुलेटरी बाधाओं के साथ काम करती थीं। नए प्रस्ताव के बाद प्लेटफॉर्म्स को अपना डेटा और IT इन्फ्रास्ट्रक्चर भारत में ही रखना होगा। साथ ही, स्मार्ट टीवी निर्माताओं को भी अनधिकृत ऐप्स हटाने की प्रक्रिया आसान बनाने का निर्देश दिया जा सकता है, जो टीवी मेकर्स और स्ट्रीमिंग सर्विस प्रोवाइडर्स के रिश्तों को बदल सकता है।

कानूनी और रेगुलेटरी चुनौतियां

यह प्रस्ताव 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' के साथ सामंजस्य को लेकर भी सवालों के घेरे में है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट आधारित कंटेंट को टेलीकॉम सर्विस की तरह देखना इंटरनेट की स्वतंत्र प्रकृति के खिलाफ हो सकता है। साथ ही, न्यूज़ और नॉन-न्यूज़ चैनलों के बीच अंतर को लेकर फ्रीडम ऑफ स्पीच पर भी बहस छिड़ सकती है, क्योंकि ब्रॉडकास्ट लाइसेंसिंग का पारंपरिक तर्क, जो एयरवेव्स की सीमित उपलब्धता पर आधारित है, वह इंटरनेट पर लागू नहीं होता।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

सूचना और प्रसारण मंत्रालय फिलहाल इन सिफारिशों की समीक्षा कर रहा है। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भविष्य में अनुपालन पर कितना खर्च बढ़ेगा। यदि अंतिम नियमों में भारी लाइसेंस फीस, कड़े तकनीकी मानक या डेटा लोकलाइजेशन के नियम थोपे जाते हैं, तो छोटी स्ट्रीमिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि क्या सरकार 'क्रिएटर इकोनॉमी' को देखते हुए लचीला रुख अपनाती है या टेलीकॉम के सख्त नियमों को लागू करती है, जो डिजिटल मीडिया सेक्टर की ग्रोथ को प्रभावित कर सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.