सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की इलेक्टोरल रोल (Electoral Roll) रिवीजन की **30 अक्टूबर** की डेडलाइन को आगे बढ़ा दिया है। कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन (EC) की उस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम लिस्ट से हटा दिए गए थे।
कोर्ट की सख्ती क्यों?
इलेक्शन कमीशन द्वारा दिल्ली में चलाए जा रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' पर सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा ब्रेक लगा दिया है। कोर्ट ने उन तौर-तरीकों पर नाराजगी जताई है, जिसके जरिए लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से डिलीट कर दिए गए। जस्टिस ने साफ किया कि प्रशासनिक अधिकार का मतलब यह नहीं है कि पात्र मतदाताओं को लिस्ट से बाहर कर दिया जाए।
फॉर्म को लेकर विवाद
विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि जिन वोटर्स ने सिर्फ अपना पता बदला था, उनसे 'फॉर्म 8' (जो पते में बदलाव के लिए होता है) भरवाने के बजाय 'फॉर्म 6' भरवाया गया, जो नए आवेदकों के लिए है। कोर्ट ने इसे नागरिकों के लिए एक अनावश्यक बाधा बताया है।
47 लाख मतदाताओं पर असर
याचिकाकर्ताओं के वकील के मुताबिक, ड्राफ्ट रोल से 47 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इलेक्शन कमीशन ने इसके पीछे मौत या माइग्रेशन जैसे कारण दिए, लेकिन कोर्ट ने कहा कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के विजिट के दौरान घर पर न मिलने का मतलब यह नहीं कि उनका नाम हमेशा के लिए हटा दिया जाए।
1.9 करोड़ एंट्रीज पर सवाल
इतना ही नहीं, कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन की उस रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए जिसमें 1.9 करोड़ एंट्रीज को 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' (Logical Discrepancy) के तहत फ्लैग किया गया था। कोर्ट का कहना है कि जो लोग 2003 से लगातार लिस्ट में हैं, उन्हें अचानक संदिग्ध बताना गलत है। अब देखना यह है कि इलेक्शन कमीशन इन आपत्तियों को दूर करने के लिए अपनी प्रक्रिया में क्या बदलाव लाता है।
