Supreme Court ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि जिन लेंडर्स का कर्जदार कंपनी के कामकाज पर गहरा नियंत्रण है, उन्हें 'Related Party' माना जाएगा। इसके बाद ये लेंडर्स अब Insolvency प्रक्रिया की कमेटी में वोटिंग नहीं कर पाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने दिवालिया कानून (Insolvency Law) को लेकर एक नई कानूनी लकीर खींच दी है। 27 अक्टूबर 2026 को आए इस फैसले के मुताबिक, जो लेंडर्स कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज में दखल रखते हैं या भारी नियंत्रण रखते हैं, उन्हें अब 'Related Party' की श्रेणी में रखा जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि वे 'Committee of Creditors' (CoC) का हिस्सा बनकर वोट नहीं डाल पाएंगे।
क्या है Palm Developers का मामला?
यह विवाद 'Palm Developers Private Limited' की दिवालिया प्रक्रिया के दौरान शुरू हुआ। ECL Finance Ltd. और IDBI Trusteeship Services Ltd. ने लगभग ₹270 करोड़ से ज्यादा के क्लेम के साथ क्रेडिटर्स कमेटी में शामिल होने की कोशिश की थी। लेकिन एक होमबायर ने आपत्ति जताई कि ये लेंडर्स डेवलपर के बोर्ड फैसलों और बजट पर पूरी तरह हावी थे। कोर्ट ने होमबायर की दलीलों को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि 'नियंत्रण' का मतलब सिर्फ मालिक होना नहीं है, बल्कि फैसले लेने की ताकत रखना भी है।
लेंडर्स के लिए क्या हैं खतरे?
अब बैंकों और NBFCs को अपने लोन एग्रीमेंट्स को दोबारा परखना होगा। आमतौर पर लेंडर्स 'Protective Covenants' का इस्तेमाल करते हैं ताकि भुगतान में देरी होने पर वे कंपनी के फैसलों में हस्तक्षेप कर सकें। इस नए नियम के बाद अगर इन एग्रीमेंट्स में लेंडर की ताकत बहुत ज्यादा दिखी, तो वे दिवालिया प्रक्रिया में अपनी वोटिंग पावर गंवा सकते हैं। इससे लोन रिकवरी की क्षमता पर बड़ा असर पड़ सकता है।
इन्वेस्टर्स के लिए सबक
बैंकों और फाइनेंशियल कंपनियों के इन्वेस्टर्स को अब यह देखना होगा कि कंपनियां अपने लोन एग्रीमेंट्स को कैसे बदलती हैं। यह फैसला भविष्य में NPA रिकवरी की प्रक्रिया को जटिल बना सकता है। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के बाद अपने अधिकारों को दूसरों को सौंपकर नियमों से बचने की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
