1 सितंबर को भारतीय बाजारों में सुस्ती देखी गई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण निवेशकों का सेंटीमेंट बिगड़ा, जिससे शानदार GDP आंकड़ों का असर भी फीका पड़ गया।
भारतीय शेयर बाजार ने सितंबर की शुरुआत कमजोर नोट के साथ की है। सेंसेक्स और निफ्टी में ऊपरी स्तरों से मुनाफावसूली देखने को मिली। बाजार की सुस्ती के पीछे मुख्य वजह ग्लोबल रिस्क हैं, विशेषकर मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल। हालांकि भारत ने फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ दर्ज की है, जो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के 7% के अनुमान से बेहतर है, लेकिन इस अच्छे डेटा को ग्लोबल चिंताओं के सामने नजरअंदाज कर दिया गया।
ऑटो सेक्टर में मिली-जुली प्रतिक्रिया
ऑटो सेक्टर में कंपनियों का प्रदर्शन काफी अलग रहा है। मारुति सुजुकी के शेयरों पर दबाव दिखा, क्योंकि कंपनी की अगस्त महीने की घरेलू सेल्स में मंथ-ऑन-मंथ 9.8% की गिरावट आई है। हालांकि सालाना आधार पर सेल्स में 34.8% की बढ़ोतरी हुई, लेकिन मंथली डेटा को बाजार ने चिंता के रूप में देखा। इसके उलट, बजाज ऑटो जैसे प्लेयर्स ने मजबूती दिखाई और कंपनी के शेयर 52-वीक हाई के स्तर पर पहुंच गए।
फाइनेंशियल स्टॉक्स और मैक्रो दबाव
बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज के शेयरों ने इंडेक्स को नीचे खींचने का काम किया। कच्चे तेल के बढ़ते दाम भारत के लिए महंगाई का खतरा बढ़ाते हैं, जिससे केंद्रीय बैंक की भविष्य की ब्याज दरों (Interest Rates) पर अनिश्चितता पैदा होती है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख को लेकर भी बाजार में असमंजस बना हुआ है, जिसका असर इमर्जिंग मार्केट्स पर दिख रहा है।
निवेशकों के लिए आउटलुक
निफ्टी 24,050 के स्तर के नीचे फिसलने के बाद बाजार में सतर्कता का माहौल है। निवेशकों को फिलहाल ग्लोबल एनर्जी प्राइसेज और मिडिल ईस्ट की स्थिति पर नजर रखने की जरूरत है। देश की इकोनॉमिक ग्रोथ मजबूत है, लेकिन शॉर्ट टर्म में बाजार का फोकस ग्लोबल लिक्विडिटी और इन्फ्लेशन रिस्क पर ही टिका रहेगा।
