गवर्नेंस को 'सजावट' से 'असली' बनाने पर जोर
SEBI के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने साफ कर दिया है कि बाज़ारों को लचीला (Resilient) बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, मजबूत गवर्नेंस और मार्केट इंटेग्रिटी सबसे ज़रूरी हैं। अब कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि वे डिस्क्लोजर (Disclosure) को सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनी मुख्य ज़िम्मेदारी समझें। कॉर्पोरेट गवर्नेंस 'सजावटी' नहीं, बल्कि 'असली' होनी चाहिए, जिसका मतलब है कि बोर्ड डायरेक्टर्स को सवाल पूछने होंगे और रचनात्मक सुझाव देने होंगे। इस दिशा में SEBI इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स (Independent Directors) की क्षमता बढ़ाने के लिए एक मल्टी-ईयर प्रोग्राम शुरू कर रहा है। हाल ही में 2025 के अंत में, SEBI ने हाई वैल्यू डेट लिस्टेड एंटिटीज (High Value Debt Listed Entities) के लिए नियमों को सख्त किया और रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शंस (Related Party Transactions) के लिए टर्नओवर-लिंक्ड लिमिट्स (Turnover-linked limits) भी जोड़ी हैं, जो बोर्ड की जवाबदेही बढ़ाने के इसी प्रयास का हिस्सा हैं।
AI और वैश्विक तनावों के साए में बाज़ार
तेजी से बढ़ रही एडवांस टेक्नोलॉजी, खासकर AI, फायदे के साथ-साथ नए जोखिम भी ला रही है। पांडे ने चेतावनी दी है कि कंप्यूटर प्रोग्राम इंसानी निगरानी से भी तेज़ चल सकते हैं, जिससे डिजिटल प्लेटफॉर्म धोखाधड़ी का जरिया बन सकते हैं। SEBI AI टूल्स से जुड़े जोखिमों पर एडवाइजरी जारी करने की योजना बना रहा है। एशिया के अन्य रेगुलेटर्स भी इस चिंता को साझा करते हैं और मिलकर AI रूल्स पर काम कर रहे हैं। इसी बीच, पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव दुनिया भर के बाज़ारों में भारी उतार-चढ़ाव ला रहा है। भारत, जो ऊर्जा आयात पर बहुत निर्भर है, के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में कोई भी व्यवधान तेल की कीमतों को बढ़ा सकता है, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ेगा, इन्फ्लेशन (Inflation) बढ़ेगी और रुपया कमज़ोर होगा। ये बाहरी झटके दिखाते हैं कि घरेलू बाज़ारों का मजबूत और कुशल होना कितना ज़रूरी है ताकि वे ऐसे दबावों को झेल सकें। मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (MIIs) इसमें अहम भूमिका निभाएंगे, जिनके गवर्नेंस रूल्स को भी जवाबदेही, अनुपालन और ऑपरेशनल स्थिरता बढ़ाने के लिए बेहतर बनाया गया है।
डेट मार्केट्स को बढ़ावा और टेक की तैयारी
SEBI डेट मार्केट्स (Debt Markets) को और गहरा करने के लिए काम कर रहा है, जिसमें नए तरह के इश्यूअर्स (Issuers) को बढ़ावा देना और ट्रेडिंग को आसान बनाना शामिल है। अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) के लिए नियमों को सरल बनाने पर भी काम चल रहा है। कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट (Corporate Bond Market) में काफी ग्रोथ देखी गई है, फाइनेंशियल ईयर 2025 तक कुल डेट इश्यू ₹53.6 ट्रिलियन तक पहुंच गया था। हालांकि, यह मार्केट अभी भी ज़्यादातर टॉप-रेटेड कंपनियों से जुड़ा है। रिटेल इन्वेस्टर्स (Retail Investors) जैसे और ज़्यादा प्रतिभागियों को शामिल करने और लिक्विडिटी (Liquidity) को बेहतर बनाने के प्रयास जारी हैं। SEBI, MIIs के लिए एक आईटी रेसिलिएंस इंडेक्स (ITRI) भी प्रस्तावित कर रहा है ताकि टेक्नोलॉजी से जुड़े जोखिमों की निगरानी को मानकीकृत (Standardize) किया जा सके। दिसंबर 2025 में मंज़ूर हुए अन्य रेगुलेटरी बदलावों में स्टॉक ब्रोकर्स (Stock Brokers), म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) और IPO फाइलिंग को सरल बनाना शामिल है।
जिन जोखिमों पर नज़र रखनी है: वैल्यूएशन, रेगुलेशन और आर्थिक चिंताएं
2026 के लिए सकारात्मक outlook के बावजूद, कई जोखिम अभी भी बने हुए हैं। भारतीय शेयर, भले ही ठीक होने की उम्मीद हो, अन्य इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) की तुलना में महंगे हैं। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के अनुसार, उनका फॉरवर्ड P/E रेश्यो (Forward P/E ratio) 23 गुना है। SEBI की पिछली कार्रवाइयां, खासकर धोखाधड़ी या डिस्क्लोजर की विफलताओं के मामले में, ऐतिहासिक रूप से शेयर की कीमतों में तेज गिरावट का कारण बनी हैं। इसके अलावा, हाल के नियम जैसे कि सख्त मार्जिन रिक्वायरमेंट्स (Margin Requirements) और 'ट्रू-टू-लेबल' (True-to-Label) नियम पहले ही बड़े लिस्टेड ब्रोकर्स के लिए भारी मुनाफे में गिरावट का कारण बन चुके हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव एक बड़ा आर्थिक जोखिम है, खासकर तेल की कीमतों में झटके के माध्यम से। ये भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट को बढ़ा सकते हैं और इन्फ्लेशन को बढ़ा सकते हैं, जिससे GDP ग्रोथ धीमी हो सकती है।
