SEBI ने बदले सोशल स्टॉक एक्सचेंज के नियम
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) को और प्रभावी बनाने के लिए कई अहम रेगुलेटरी बदलावों की घोषणा की है। अब NPOs का SSE पर रजिस्ट्रेशन 2 साल के बजाय 3 साल के लिए वैलिड होगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि कई बार NPOs को जरूरी अप्रूवल मिलने में देरी हो जाती है। लंबी वैलिडिटी से रजिस्टर्ड संस्थाएं तुरंत फंड जुटाने के दबाव के बिना लिस्टेड रह सकेंगी, जिससे वे ज्यादा स्थिर तरीके से काम कर पाएंगी।
SEBI ने जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल (ZCZP) इंस्ट्रूमेंट्स के लिए न्यूनतम सब्सक्रिप्शन की सीमा को 75% से घटाकर 50% कर दिया है। इससे फंड जुटाने में काफी लचीलापन आएगा, खासकर उन प्रोजेक्ट्स के लिए जिनके नतीजे साफ हों। इससे पहले, रेगुलेटर ने रिटेल निवेशकों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए ZCZP इंस्ट्रूमेंट्स के मिनिमम एप्लीकेशन साइज को ₹10,000 से घटाकर ₹1,000 कर दिया था। ये बदलाव दिखाते हैं कि SEBI SSE प्लेटफॉर्म पर भागीदारी को आसान बनाने और सोशल इंपैक्ट इन्वेस्टिंग को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है।
SSE की पृष्ठभूमि और बाजार एकीकरण
भारत में सोशल स्टॉक एक्सचेंज की परिकल्पना पहली बार 2019-20 के बजट में की गई थी और SEBI ने सितंबर 2021 में इसे मंजूरी दी थी। यह BSE और NSE जैसे मौजूदा एक्सचेंजों के भीतर एक अलग सेगमेंट के रूप में काम करता है। इसका लक्ष्य सोशल एंटरप्राइजेज और NPOs को फंड जुटाने के लिए एक रेगुलेटेड मार्केटप्लेस प्रदान करके कैपिटल जुटाना है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के सोशल सेक्टर को काफी बड़े फंडिंग गैप का सामना करना पड़ा है। SSE का उद्देश्य प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और परोपकार को आकर्षित करके इस गैप को भरना है। ZCZP जैसे इंस्ट्रूमेंट्स और पूलड इन्वेस्टमेंट स्ट्रक्चर्स इसके जरिए संभव हैं।
SSE की व्यवहार्यता के लिए चुनौतियां
SEBI के प्रयासों के बावजूद, SSE के सामने कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। दुनिया भर में सोशल स्टॉक एक्सचेंजों का ट्रैक रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है, जिनमें से कई कम निवेशक मांग और कमजोर बिजनेस मॉडल के कारण संघर्ष कर रहे हैं। छोटे NPOs के लिए कंप्लायंस का बोझ एक बड़ी चिंता का विषय हो सकता है। ZCZPs के लिए नए 50% सब्सक्रिप्शन मिनिमम पर फंडेड प्रोजेक्ट्स के लिए ड्यू डिलिजेंस करना भी एक ऑपरेशनल चुनौती है। सोशल इंपैक्ट को मापना और परिभाषित करना भी इस क्षेत्र के लिए एक सतत चुनौती है। इन बदलावों की सफलता SSE की ड्यू डिलिजेंस, कंप्लायंस लागत को प्रबंधित करने और सोशल इंपैक्ट इन्वेस्टमेंट्स की मांग बनाने की क्षमता पर निर्भर करेगी।