SEBI ने डेरिवेटिव्स (F&O) बैन की कैलकुलेशन के लिए 'Future Equivalent' (FutEq) का नया सिस्टम लागू किया है। यह बदलाव भले ही रिस्क मैनेजमेंट के लिए हो, लेकिन ट्रेडर्स के लिए अपनी मल्टी-लेग पोजीशन को मैनेज करना अब एक बड़ी मुश्किल बन गया है।
क्या है नया सिस्टम और दिक्कतें?
SEBI ने मार्केट वाइड पोजीशन लिमिट (MWPL) और F&O बैन को ट्रैक करने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। अब यह पुराने तरीके के बजाय 'डेल्टा-बेस्ड' यानी 'Future Equivalent' (FutEq) एक्सपोजर के आधार पर तय होता है। इसका मकसद मार्केट की एकाग्रता को समझना है, लेकिन इसके चलते उन ट्रेडर्स को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है जो हेजिंग के लिए मल्टी-लेग स्ट्रैटेजी इस्तेमाल करते हैं।
हेजिंग में 'Sign-Flip' का संकट
स्ट्रैडल (Straddles) और स्ट्रैंगल (Strangles) जैसी हेजिंग पोजीशन को 'डेल्टा-न्यूट्रल' रखने के लिए बनाया जाता है। लेकिन नए नियमों के मुताबिक, यदि ट्रेड के दौरान डेल्टा 'पॉजिटिव से नेगेटिव' (या इसके उलट) हो जाता है, तो सिस्टम इसे रेगुलेटरी उल्लंघन मान सकता है। इसका मतलब है कि एक लेग बंद करने पर बची हुई पोजीशन का डेल्टा अगर जीरो के पार चला जाए, तो आप मुश्किल में पड़ सकते हैं। ट्रेडर्स अब अपनी पोजीशन का हिस्सा एडजस्ट करने के बजाय पूरी स्ट्रैटेजी को एक साथ बंद करने के लिए मजबूर हैं, जिससे मार्केट में लिक्विडिटी रिस्क भी बढ़ गया है।
2 PM की अनिश्चितता
ट्रेडर्स के लिए सबसे बड़ी परेशानी 2 PM की डेडलाइन बन गई है। क्लीयरिंग कॉर्पोरेशन इसी समय डेल्टा वैल्यू को फाइनल करता है। दिनभर ट्रेड करने के बाद भी ट्रेडर्स को यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका ट्रेड नियमों के दायरे में है या नहीं, क्योंकि फाइनल वैल्यू शाम 2 बजे ही तय होती है। ब्रोकरेज फर्म्स के अलग-अलग रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम (RMS) के चलते, कई प्लेटफॉर्म्स ने एहतियातन ट्रेडिंग पर रोक लगा दी है, जिससे ट्रेडर्स को असमान चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
क्या बदलाव की उम्मीद है?
मार्केट एक्सपर्ट्स इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कुछ सुझाव दे रहे हैं:
- Delta Band: जीरो के आसपास एक न्यूट्रल बैंड तय करना ताकि छोटे-मोटे डेल्टा फ्लक्चुएशन को इग्नोर किया जा सके।
- Cure Window: छोटी गलतियों के लिए सुधरने का मौका देना।
- Exemption: मौजूदा पोजीशन बंद करने वाले ट्रेड्स को रेगुलेटरी उल्लंघन के दायरे से बाहर रखना।
