SEBI का नया स्टैंड: डेरिवेटिव्स में 'वेट एंड वॉच', SME IPOs के लिए नियम सख्त!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
SEBI का नया स्टैंड: डेरिवेटिव्स में 'वेट एंड वॉच', SME IPOs के लिए नियम सख्त!
Overview

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने साफ कर दिया है कि डेरिवेटिव्स मार्केट में फिलहाल कोई और बड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी। रेगुलेटर नई नीतियों के असर का इंतजार करेगा और साथ ही ऑप्शन ट्रेडिंग में सट्टेबाजी पर लगाम लगाने पर अपना फोकस बनाए रखेगा।

रेगुलेटरी रीकैलिब्रेशन (Regulatory Recalibration)

SEBI चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने देश के डेरिवेटिव्स मार्केट को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट की है। अब रेगुलेटर 'देखो और इंतज़ार करो' (wait and watch) वाली अप्रोच अपना रहा है। यानी, नई लाई गईগুলোর असर पूरी तरह साफ होने तक कोई और बड़ा कदम उठाने से SEBI परहेज़ करेगा। इस फैसले का मकसद पॉलिसी में स्थिरता लाना है, ताकि मार्केट में अनुमान और भरोसे का माहौल बना रहे। पांडे ने खास तौर पर ऑप्शंस ट्रेडिंग (options trading), जिसमें इंडेक्स ऑप्शंस और वीकली एक्सपायरी (weekly expiry) सबसे ज़्यादा चिंता का विषय हैं, पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। यह फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट के बाकी हिस्सों से अलग है। SEBI की यह सावधानी पुरानी मिसालों से भी प्रेरित है, क्योंकि पिछला डेटा दिखाता है कि 2023 के आखिर और 2025 की शुरुआत में किए गए सख़्ती (tightening) के उपायों से रिटेल ट्रेडिंग एक्टिविटी और डेरिवेटिव्स टर्नओवर में काफी गिरावट आई थी।

सट्टेबाजी बनाम ग्रोथ (Speculation vs. Growth)

SEBI की इस 'सब्र' वाली नीति के पीछे एक बड़ी वजह शेयरों के डेरिवेटिव्स में रिटेल निवेशकों को हो रहा भारी नुकसान है। अलग-अलग स्टडीज़ के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2025 में लगभग 91% रिटेल ट्रेडर्स को नेट लॉस (net loss) हुआ, और उनका कुल नुकसान 41% बढ़कर ₹1.06 लाख करोड़ तक पहुँच गया। भले ही हाल के रेगुलेटरी कदमों से ओवरऑल ट्रेडिंग वॉल्यूम अक्टूबर 2024 के अपने उच्चतम स्तर से 75% तक कम हो गया है, फिर भी इंडेक्स ऑप्शंस में सट्टेबाजी की तीव्रता एक चिंता का विषय बनी हुई है। SEBI के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि वह रिटेल निवेशकों के भारी नुकसान का सबब बनने वाली सट्टेबाजी पर लगाम तो लगाए, लेकिन साथ ही मार्केट की ग्रोथ की संभावनाओं को भी रुकने न दे।

SME IPOs: नींव को मज़बूत करना

डेरिवेटिव्स मार्केट से हटकर, SEBI स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (SME) के इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) सेगमेंट की इंटीग्रिटी (integrity) को मज़बूत करने पर भी सक्रिय रूप से काम कर रहा है। पिछले कुछ समय में मार्केट मैनिपुलेशन (market manipulation) और लिस्टिंग के बाद स्टॉक्स के हाई सस्पेंशन रेट्स (high suspension rates) जैसी समस्याओं को देखते हुए, SEBI अपने रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को और कड़ा कर रहा है। इसमें अब ज़्यादा ड्यू डिलिजेंस (due diligence), साइट विजिट और थर्ड-पार्टी मॉनिटरिंग (third-party monitoring) जैसी चीज़ें शामिल होंगी। साथ ही, मर्चेंट बैंकरों (merchant bankers) पर भी यह ज़िम्मेदारी बढ़ाई जा रही है कि वे लिस्ट होने वाली कंपनियों की क्वालिटी सुनिश्चित करें। मार्च 2025 से लागू होने वाले नए नियमों के तहत, अब किसी भी SME कंपनी को लिस्ट होने के लिए पिछले 3 फाइनेंशियल इयर्स में से कम से कम 2 में ₹1 करोड़ का ऑपरेटिंग प्रॉफिट (EBITDA) कमाना ज़रूरी होगा। यह नियम कमज़ोर प्रॉफिट ट्रैक रिकॉर्ड वाली कंपनियों को पब्लिक कैपिटल एक्सेस करने से रोकेगा।

गवर्नेंस और इंटरनल कंट्रोल्स (Governance and Internal Controls)

SEBI का यह सक्रिय रवैया सिर्फ बाहरी मार्केट तक सीमित नहीं है, बल्कि इंटरनल गवर्नेंस (internal governance) को लेकर भी है। 23 मार्च को होने वाली SEBI बोर्ड मीटिंग में 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (conflict of interest) कमेटी की कई अहम सिफारिशों पर विचार किया जाएगा। इन सिफारिशों में टॉप ऑफिशियल्स के लिए डिस्क्लोजर (disclosure) की ज़रूरतों को बढ़ाना, 'जीरो-टॉलरेंस' (zero-tolerance) कल्चर को बढ़ावा देना और रिटायरमेंट के बाद 2 साल तक के लिए नई असाइनमेंट्स पर रोक लगाना शामिल है। इसके अलावा, SEBI उन चिंताओं पर भी गौर कर रहा है जो मार्केट इंटरमीडियरीज (market intermediaries) ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग (proprietary trading) के लिए नए बैंक गारंटी (bank guarantee) रूल्स को लेकर उठाई हैं। RBI की 100% कोलैटरल (collateral) की ज़रूरत ने गारंटी प्राप्त करने की लागत और कठिनाई को बढ़ा दिया है, जिससे लिक्विडिटी (liquidity) पर संभावित असर पड़ने की आशंका है।

आगे का रास्ता

SEBI के इन नापे-तुले कदमों के बावजूद, मार्केट में कुछ जोखिम बने हुए हैं। ऑप्शंस ट्रेडिंग में रिटेल सट्टेबाजी की मूल समस्या अभी भी जस की तस है, और रेगुलेटरी प्रयासों के बावजूद यह फिर से बढ़ सकती है। SME IPOs के लिए नए फ्रेमवर्क की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसका कितना कड़ाई से पालन करवाया जाता है। वहीं, RBI के नए कोलैटरल रूल्स मार्केट लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी (price discovery) को प्रभावित कर सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि SEBI का वर्तमान रुख स्थिरता की ओर एक ज़रूरी कदम है, लेकिन भविष्य में कुछ और रेगुलेटरी एडजस्टमेंट (adjustments) देखने को मिल सकते हैं। मार्केट पार्टिसिपेंट्स उम्मीद कर रहे हैं कि SEBI डेरिवेटिव्स एक्टिविटी, खासकर ऑप्शंस पर बारीकी से नज़र रखेगा और अगर सट्टेबाजी के ट्रेंड्स फिर से बढ़े तो आगे कार्रवाई कर सकता है।

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