SEBI ने हाल ही में लागू हुए Closing Auction Session और F&O कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट को अलग करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अगस्त 2026 से जारी मार्केट वॉलैटिलिटी को कम करने के लिए रेगुलेटर अब इस सिस्टम की समीक्षा करेगा।
बाजार की अस्थिरता पर लगाम की तैयारी
मार्केट रेगुलेटर SEBI ने डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट को लेकर बढ़ती चिंताओं पर एक्शन लिया है। 3 सितंबर 2026 को जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि रेगुलेटर उस मौजूदा मेथोडोलॉजी की समीक्षा करेगा, जिसके तहत एक्सपायर होने वाले फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) कॉन्ट्रैक्ट्स को 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन' से जोड़ा गया है। यह फैसला अगस्त 2026 में सिस्टम के लागू होने के बाद से बाजार में देखी गई भारी उतार-चढ़ाव और निवेशकों की शिकायतों के बाद लिया गया है।
नई व्यवस्था से क्या है समस्या?
अगस्त में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन शुरू होने के बाद से ही कारोबार के आखिरी मिनटों में कीमतों में अजीबोगरीब हलचल देखी जा रही है। मुख्य समस्या यह है कि अब कैश मार्केट को डेरिवेटिव्स सेटलमेंट के भारी-भरकम ऑर्डर्स का दबाव झेलना पड़ रहा है। इस मिसमैच के कारण लिक्विडिटी गैप पैदा हो रहे हैं, जिससे ट्रेडर्स के लिए अपनी पोजीशन को कुशलतापूर्वक एग्जीक्यूट करना मुश्किल हो गया है। इसके चलते कई ट्रेडर्स के लिए 'डायनेमिक डेल्टा हेजिंग' (जोखिम कम करने की रणनीति) करना भी कठिन हो गया है।
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स पर असर
म्यूचुअल फंड्स और पैसिव फंड्स जैसे बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स के लिए यह वॉलैटिलिटी एक बड़ा ऑपरेशनल रिस्क बन गई है। चूंकि उनकी परफॉर्मेंस ऑफिशियल क्लोजिंग प्राइस के आधार पर मापी जाती है, इसलिए कीमत में मामूली अंतर भी 'ट्रैकिंग एरर' का कारण बनता है।
बाजार का रिएक्शन और आगे क्या?
रेगुलेटर के इस फैसले के बाद 4 सितंबर 2026 को Angel One समेत ब्रोकरेज शेयरों में तेजी देखी गई, क्योंकि निवेशकों को उम्मीद है कि सेटलमेंट स्थिर होने से ट्रेडिंग बेहतर होगी। अब सबकी नजरें SEBI द्वारा अगले एक हफ्ते में आने वाले 'कंसल्टेशन पेपर' पर हैं, जो यह तय करेगा कि मौजूदा सिस्टम में कोई बड़ा बदलाव होगा या इसे सिर्फ मामूली सुधार के साथ जारी रखा जाएगा।
