SEBI ने बड़ा ऐलान किया है। अब बायबैक (Buyback) और ऑफर फॉर सेल (OFS) को क्लियरिंग इंटरऑपरेबिलिटी फ्रेमवर्क में शामिल किया जाएगा। इस बदलाव की डेडलाइन नवंबर 2026 तय की गई है, जिससे ब्रोकर्स के लिए नियमों का पालन करना और भी सरल हो जाएगा।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कॉरपोरेट एक्शन को लेकर एक बड़ा नीतिगत बदलाव पेश किया है। चेयरमैन तुहीन कांत पांडे ने स्पष्ट किया है कि बायबैक, टेंडर ऑफर और ऑफर फॉर सेल (OFS) जैसी प्रक्रियाओं को अब क्लियरिंग इंटरऑपरेबिलिटी फ्रेमवर्क के तहत लाया जाएगा। इस पूरे बदलाव के लिए नवंबर 2026 तक की समय सीमा तय की गई है।
ब्रोकर्स के लिए राहत की खबर
मौजूदा समय में ब्रोकर्स को इन कॉर्पोरेट एक्शन के लिए काफी भाग-दौड़ और जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। फिलहाल उन्हें Bombay Stock Exchange (BSE) और National Stock Exchange (NSE) दोनों के लिए अलग-अलग क्लियरिंग व्यवस्था बनाए रखनी पड़ती है। इसका मतलब है कि उन्हें अलग मार्जिन, डिपॉजिट और फीस का प्रबंधन करना पड़ता है, जिससे उनका काफी पूंजी फंस जाती है।
बाजार में आएगी पारदर्शिता और दक्षता
साल 2019 से लागू इंटरऑपरेबिलिटी फ्रेमवर्क पहले से ही स्टैंडर्ड प्रोडक्ट्स के लिए प्रभावी है, लेकिन अब इसमें टेंडर-आधारित गतिविधियों को शामिल करने से 'क्रॉस-एक्सचेंज नेटिंग' संभव हो सकेगी। इससे ब्रोकर्स के ऑपरेशनल खर्चों में बड़ी कमी आएगी और वे पूंजी को और बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर पाएंगे।
सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन पर रहेगा जोर
SEBI ने साफ किया है कि इस सरलीकरण का मतलब सुरक्षा मानकों से समझौता करना बिल्कुल नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के दौरान रेगुलेटर का मुख्य फोकस सेटलमेंट सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन (Risk Management) को और मजबूत बनाए रखना होगा। आने वाले समय में क्लियरिंग कॉरपोरेशन की ओर से विस्तृत गाइडलाइंस और तकनीकी बदलावों की जानकारी जारी की जाएगी, जिस पर बाजार के सभी प्रतिभागियों की नजर बनी हुई है।
