भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की ओर से पैसिव म्यूचुअल फंड स्कीम्स की संख्या को सीमित करने पर विचार किया जा रहा है। इसका मकसद प्रोडक्ट की अनावश्यक भीड़ को कम करना और रिटेल निवेशकों के लिए चुनाव को आसान बनाना है, हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे इनोवेशन और निवेश के विकल्पों में कमी आ सकती है।
SEBI क्यों कर रहा है ये बदलाव?
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) की ओर से एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) के लिए नई गाइडलाइन्स पर शुरुआती चर्चाएं चल रही हैं। इन गाइडलाइन्स के तहत, AMC द्वारा लॉन्च की जाने वाली पैसिव म्यूचुअल फंड स्कीम्स की संख्या पर सीमा लगाई जा सकती है। यह कदम म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री को व्यवस्थित करने और इंडेक्स को ट्रैक करने वाले एक जैसे प्रोडक्ट्स की भारी भीड़ से रिटेल निवेशकों को बचाने के SEBI के बड़े प्लान का हिस्सा है।
पैसिव फंड्स का बढ़ता बाज़ार
पैसिव फंड्स, जो किसी इंडेक्स (जैसे निफ्टी या सेंसेक्स) के प्रदर्शन को कॉपी करते हैं, भारत में तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, पैसिव फंड्स का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹15.5 ट्रिलियन तक पहुँच गया था, जो कुल म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री AUM का 18% है। अकेले अगस्त 2026 तक के एक साल में 130 से ज़्यादा नई पैसिव फंड स्कीम्स लॉन्च की गईं, जबकि इसी दौरान केवल 86 एक्टिव फंड स्कीम्स लॉन्च हुईं।
'रिडंडेंसी' का क्या है मसला?
नियामक (Regulator) को मार्केट में 'रिडंडेंसी' या अनावश्यक दोहराव की चिंता सता रही है। AMCs ने एक जैसे इन्वेस्टमेंट फैक्टर्स (जैसे मोमेंटम, वैल्यू, या क्वालिटी) को ट्रैक करने वाले कई फंड्स लॉन्च कर दिए हैं, भले ही उनके अंतर्निहित मार्केट कैप सेगमेंट में मामूली अंतर हों। यह निवेशकों को ज़्यादा विकल्प तो देता है, लेकिन रेगुलेटर को डर है कि इससे रिटेल निवेशकों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, क्योंकि वे इन प्रोडक्ट्स के बीच के सूक्ष्म अंतरों को नहीं समझ पाते।
इंडस्ट्री की चिंताएं और सुझाव
हालांकि, कुछ मार्केट एक्सपर्ट्स ने इन संभावित कैप्स के असर पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर रेगुलेटर पैसिव स्कीम्स की संख्या सीमित करता है, तो फंड हाउसेज की नई और इनोवेटिव इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजीज़ लाने की क्षमता सीमित हो सकती है। सख्त कैप के आलोचकों का तर्क है कि रेगुलेटर का मकसद फंड्स की संख्या के बजाय इंडेक्स की क्वालिटी पर ध्यान केंद्रित करके बेहतर ढंग से हासिल किया जा सकता है। खासतौर पर, लिक्विडिटी, ट्रांसपेरेंसी और अंडरलाइंग इंडेक्स को रेप्लिकेट करने की क्षमता के लिए उच्च मानक तय करने से, निवेश के विकल्पों को सीमित किए बिना खराब क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स की समस्या का समाधान हो सकता है।
आगे क्या?
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये चर्चाएं अभी शुरुआती दौर में हैं। फिलहाल कोई औपचारिक पॉलिसी, सर्कुलर या ड्राफ्ट रेगुलेशन मौजूद नहीं है। इंडस्ट्री का रेगुलेटरी परिदृश्य भी लगातार विकसित हो रहा है, और व्यापक नए म्यूचुअल फंड रेगुलेशन 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी हुए हैं।
निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स को इस पर नजर रखनी चाहिए कि क्या रेगुलेटर कोई औपचारिक कंसल्टेशन पेपर जारी करता है, जिससे इन संभावित सीमाओं की संरचना के बारे में अधिक स्पष्टता मिलेगी। फिलहाल, यह देखना अहम होगा कि SEBI प्रोडक्ट चॉइस को सरल बनाने की ज़रूरत और पैसिव इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजीज़ में इनोवेशन की इंडस्ट्री की चाहत के बीच कैसे संतुलन बनाता है।
