SEBI अब निवेश सलाहकारों और रिसर्च एनालिस्टों पर PaRRVA फ्रेमवर्क लागू करने का दबाव बना रही है। हालांकि, भारी-भरकम एनुअल कंप्लायंस फीस के चलते कंपनियां इसे अपनाने में सुस्ती दिखा रही हैं।
मार्केट रेगुलेटर SEBI अब बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए पूरी तरह सख्त हो गया है। इसी दिशा में 'पास्ट रिस्क एंड रिटर्न वेरिफिकेशन एजेंसी' (PaRRVA) प्लेटफॉर्म को अनिवार्य किया जा रहा है। मई 2026 में शुरू हुआ यह प्लेटफॉर्म निवेश सलाहकारों, रिसर्च एनालिस्टों और एल्गोरिदम ट्रेडिंग सर्विस प्रोवाइडर्स द्वारा किए गए दावों की निष्पक्ष जांच करेगा।
क्यों लाया गया है यह सिस्टम?
इसका मुख्य मकसद निवेशकों को भ्रामक जानकारी से बचाना है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) इस प्लेटफॉर्म के लिए डेटा सेंटर की भूमिका निभा रहा है, जबकि CARE Ratings Limited को वेरिफिकेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसका मतलब है कि अब कंपनियों को अपने हर परफॉर्मेंस दावे का एक ऑडिट ट्रेल बनाए रखना होगा।
कंपनियों की क्या है दिक्कत?
नियम तो सख्त हैं, लेकिन इसे लागू करने की राह में सबसे बड़ी बाधा 'कंप्लायंस फीस' है। रिपोर्ट्स की मानें तो क्वालिफाइड स्टॉक ब्रोकर्स के लिए सालाना खर्च ₹1 करोड़ तक जा सकता है, वहीं अन्य सदस्यों के लिए यह फीस ₹40 लाख के करीब है। छोटे रिसर्च और एडवाइजरी फर्मों के लिए यह खर्च उनके बिजनेस मॉडल पर सीधा असर डाल रहा है, जिससे रजिस्ट्रेशन की रफ्तार धीमी बनी हुई है।
डेडलाइन पर रखें नजर
निवेशकों और ब्रोकरेज फर्मों को 3 मई, 2028 की तारीख याद रखनी होगी। इस तारीख के बाद सभी इंटरमीडियरीज के लिए क्लाइंट कम्यूनिकेशन और परफॉर्मेंस मेट्रिक्स का PaRRVA के जरिए वेरिफाई होना अनिवार्य है। जो कंपनियां इस बदलाव को नहीं अपनाएंगी, वे अपना ऐतिहासिक डेटा प्रदर्शित नहीं कर पाएंगी, जो उनकी मार्केटिंग और क्लाइंट एक्विजिशन के लिए बड़ा झटका हो सकता है। अब देखना यह है कि क्या कंपनियां समय रहते इस लागत के साथ तालमेल बिठा पाती हैं या रेगुलेटर नियमों में कोई राहत देता है।
