SEBI का ETF पर बड़ा दांव! T-2 से T-1 NAV में बदलाव, बाज़ार में बढ़ेगी क्लैरिटी

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AuthorNeha Patil|Published at:
SEBI का ETF पर बड़ा दांव! T-2 से T-1 NAV में बदलाव, बाज़ार में बढ़ेगी क्लैरिटी
Overview

भारतीय शेयर बाज़ार के रेगुलेटर SEBI ने एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) की प्राइसिंग में बड़े बदलाव का ऐलान किया है। अब T-2 की जगह T-1 नेट एसेट वैल्यू (NAV) सिस्टम लागू होगा, जिससे बाज़ार की वोलेटिलिटी (volatility) के दौरान प्राइस डिस्कवरी (price discovery) बेहतर होगी। इसके साथ ही, फिक्स्ड **20%** की जगह कैलिब्रेटेड प्राइस बैंड (calibrated price bands) भी लाए जा रहे हैं।

SEBI का यह कदम ETFs और उनके इंट्रिन्सिक वैल्यू (intrinsic value) के बीच के गैप को पाटने के लिए उठाया गया है, खासकर तब जब बाज़ार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। मौजूदा T-2 सिस्टम में एक दिन की देरी के कारण ETF की ट्रेडिंग प्राइस और उसकी असली कीमत के बीच काफी अंतर आ जाता था, जिससे गलत सिग्नल मिलते थे।

Mirae Asset Investment Managers (India) के सिद्धार्थ श्रीवास्तव बताते हैं कि T-2 सिस्टम में कॉर्पोरेट एक्शन (corporate action) के लिए मैनुअल एडजस्टमेंट (manual adjustment) करने पड़ते थे, जिसमें गलतियों की गुंजाइश बनी रहती थी। नया T-1 फ्रेमवर्क ज़्यादा करंट वैल्यूएशन मेट्रिक (current valuation metric) का इस्तेमाल करेगा, जिससे निवेशकों को बाज़ार की मौजूदा हालत का सही अंदाज़ा मिलेगा।

इसके अलावा, SEBI ने प्राइस बैंड्स को भी बदला है। अब गोल्ड और सिल्वर ETFs के लिए 6% का शुरुआती बैंड होगा, जो बढ़कर 20% तक जा सकता है। वहीं, इक्विटी और डेट ETFs के लिए यह 10% से शुरू होकर 20% तक बढ़ाया जा सकेगा। यह यूरोप और अमेरिका जैसे बाज़ारों से अलग है, जहाँ फिक्स्ड बैंड की बजाय सर्किट ब्रेकर्स (circuit breakers) या 'लिमिट अप-लिमिट डाउन' (limit up-limit down) जैसे नियमों का इस्तेमाल होता है।

ऐसे समय में जब India VIX (मार्केट की वोलेटिलिटी का इंडिकेटर) बढ़ता है, T-2 की देरी ETF की कीमतों पर उसके असर को और बढ़ा देती थी। T-1 शिफ्ट इस संवेदनशीलता को कम करने में मदद करेगा।

हालांकि, इस बदलाव में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। फंड हाउस को देर रात NAV डिक्लेयर (declare) करना होगा, जिसे एक्सचेंजों को एडजस्ट करना पड़ेगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि T-1 में भी इंट्र-डे वोलेटिलिटी (intra-day volatility) से लैग (lag) रह सकता है। कैलिब्रेटेड बैंड्स अगर ठीक से प्लान न किए गए तो लिक्विडिटी (liquidity) बंट सकती है या नए आर्बिट्रेज मौके (arbitrage opportunities) बन सकते हैं।

कुल मिलाकर, SEBI का यह नया ढांचा भारतीय ETF बाज़ार के लिए एक अहम विकास है। यह बाज़ार को ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस (global best practices) के करीब लाएगा और बढ़ती वोलेटिलिटी के बीच निवेशकों को ज़्यादा सुरक्षा देगा। इन बदलावों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एक्सचेंज इन्हें कितनी आसानी से लागू करते हैं और बाज़ार कितनी जल्दी नए आर्बिट्रेज डायनामिक्स (arbitrage dynamics) और लिक्विडिटी पैटर्न (liquidity patterns) के साथ तालमेल बिठाता है।

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