भारत का ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) सेक्टर **₹17.53 लाख करोड़** के पड़ाव पर पहुंच गया है। लेकिन इस बढ़त के साथ ही हितों के टकराव (Conflict of Interest) की खबरें भी बढ़ गई हैं। अब SEBI ने निवेशकों की सुरक्षा के लिए नए नियम पेश किए हैं, जिसमें **75%** इन्वेस्टर कंसेंट का प्रावधान शामिल है।
बाजार की हकीकत और रेगुलेटरी चिंताएं
जून 2026 तक AIF इकोसिस्टम ₹17.53 लाख करोड़ के कमिटमेंट्स के साथ एक बड़ी ऊंचाई पर है। इस ग्रोथ के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि कई बड़े वेल्थ मैनेजर्स खुद ही इन प्रोडक्ट्स को बना रहे हैं और खुद ही डिस्ट्रीब्यूट कर रहे हैं। इस दोहरी भूमिका के कारण निवेशक अक्सर अपने सलाहकार पर पूरा भरोसा नहीं कर पाते, क्योंकि एडवाइजर का मुनाफा इन-हाउस प्रोडक्ट्स को बेचने में ज्यादा होता है।
SEBI का नया मास्टरप्लान
इन गड़बड़ियों को रोकने के लिए, मार्केट रेगुलेटर SEBI ने कमर कस ली है:
- 75% कंसेंट नियम: अब किसी भी बड़े फैसले या ट्रांजैक्शन के लिए निवेशकों की 75% सहमति अनिवार्य होगी।
- रिलेटेड पार्टी फ्रेमवर्क: SEBI 'एसोसिएट' की पुरानी परिभाषा को बदलकर 'कंपनीज एक्ट, 2013' के तहत ज्यादा व्यापक 'रिलेटेड पार्टी' फ्रेमवर्क लागू करने जा रही है, ताकि फंड मैनेजर्स पारदर्शिता से बच न सकें।
पारदर्शिता का अभाव
म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के उलट, AIF सेक्टर में डिस्ट्रीब्यूटर की कमाई का कोई सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस नहीं है। इसका सीधा असर यह पड़ता है कि निवेशक यह नहीं जान पाते कि उनका सलाहकार उन्हें निष्पक्ष राय दे रहा है या फिर अपनी कंपनी का प्रोडक्ट जबरदस्ती चिपका रहा है।
निवेशकों के लिए आगे का रास्ता
SEBI का इरादा कमीशन बैन करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि निवेश के फैसलों पर निवेशकों का कंट्रोल ज्यादा हो। आने वाले समय में वेल्थ मैनेजमेंट कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल में बड़े बदलाव करने होंगे। निवेशकों को अब इन नई गवर्नेंस गाइडलाइंस और कंपनियों द्वारा किए जाने वाले डिस्क्लोजर पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
