SEBI की एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि IPO में पैसा लगाने वाले एंकर इन्वेस्टर्स लिस्टिंग के एक साल के भीतर ही अपने **50%** से ज्यादा शेयर बेच रहे हैं। विदेशी निवेशकों (FPIs) की तरफ से की जा रही यह बिकवाली रिटेल निवेशकों के लिए मुसीबत का सबब बन रही है।
क्या कहता है SEBI का डेटा?
SEBI ने अप्रैल 2022 से अक्टूबर 2025 के बीच आए 242 मेनबोर्ड IPOs का विश्लेषण किया है। इस स्टडी से साफ हुआ है कि एंकर इन्वेस्टर्स, जिनका काम कंपनी को लिस्टिंग के बाद स्टेबिलिटी देना होता है, वही सबसे ज्यादा बिकवाली कर रहे हैं। ये इन्वेस्टर्स अपने अलॉट किए गए शेयरों का करीब 50.7% हिस्सा महज एक साल में बाजार में डंप कर रहे हैं।
कौन सबसे ज्यादा कर रहा है बिकवाली?
बिकवाली के मामले में विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) सबसे आगे हैं। FPIs ने पहले साल में ही अपनी होल्डिंग का लगभग 60% हिस्सा बेच दिया है। वहीं, घरेलू म्यूचुअल फंड्स की भूमिका तुलनात्मक रूप से बेहतर रही है, जिन्होंने इस दौरान करीब 38% हिस्सेदारी बेची है। खास बात यह है कि ₹250 करोड़ से कम साइज वाले IPOs में यह बिकवाली सबसे ज्यादा आक्रामक देखी गई है।
रिटेल निवेशकों के लिए रिस्क
ज्यादातर मामलों में, लॉक-इन पीरियड खत्म होते ही (खासकर 30 दिन के बाद) बिकवाली का दबाव बढ़ जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, जब ये बड़े खिलाड़ी शेयर बेचते हैं, तो स्टॉक प्राइस में औसतन 3.5% तक की गिरावट दर्ज की जाती है।
आगे क्या?
इस रिपोर्ट के बाद अब मार्केट रेगुलेटर IPO के नियमों में बदलाव पर विचार कर रहा है। हो सकता है कि आने वाले समय में लॉक-इन पीरियड को बढ़ाया जाए या मिनिमम सब्सक्रिप्शन लिमिट में बदलाव किए जाएं। फिलहाल, निवेशकों को सलाह है कि किसी भी IPO में एंकर इन्वेस्टर्स की मौजूदगी को ही 'लॉन्ग-टर्म भरोसे' का पैमाना न मानें और लॉक-इन एक्सपायरी डेट्स पर नजर रखें।
