SEBI ने ग्लोबल फाइनेंशियल फर्मों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है, जो हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग के जरिए क्लोजिंग ऑक्शन (CAS) में हेरफेर करती हैं। 13 अगस्त, 2026 की एक घटना के बाद रेगुलेटर अब डेरिवेटिव मार्केट में रिटेल निवेशकों को सुरक्षित करने के लिए सख्ती बढ़ा रहा है, जबकि लंबी अवधि के विदेशी निवेशकों के लिए नियमों में ढील दी गई है।
रेगुलेटर का नया रुख
SEBI अब ग्लोबल फाइनेंशियल संस्थानों के प्रति अपनी अप्रोच बदल रहा है। रेगुलेटर का मुख्य फोकस उन एल्गोरिदम और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग पर है, जो क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के दौरान मार्केट में अस्थिरता पैदा करते हैं।
क्यों मचा है बवाल?
यह सख्ती 13 अगस्त, 2026 की एक घटना के बाद बढ़ी है। SEBI ने JPMorgan की मॉरीशस स्थित यूनिट, Copthall Mauritius Investment Ltd., और घरेलू ब्रोकर Mansi Share and Stock Broking पर ऑक्शन में हेरफेर का आरोप लगाया है। आरोप है कि इन संस्थाओं ने ऑक्शन में भारी मात्रा में ऑर्डर डाले और बाद में उन्हें कैंसिल कर दिया, ताकि सेटलमेंट प्राइस को प्रभावित किया जा सके। इससे पहले July 2025 में Jane Street Group पर भी इंडेक्स हेरफेर के आरोप में प्रतिबंध लगाया गया था, जो मामला अभी Securities Appellate Tribunal में है।
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए राहत
हालाँकि, SEBI विदेशी पूंजी को लेकर सतर्क है। जो Foreign Portfolio Investors (FPIs) केवल सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश कर रहे हैं, उन्हें अब विस्तृत इन्वेस्टर ग्रुप की जानकारी देने से छूट दी गई है। यह कदम Reserve Bank of India के कंसंट्रेशन लिमिट हटाने के फैसले के साथ तालमेल बिठाने के लिए उठाया गया है।
मार्केट पर असर
आने वाले समय में हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग करने वाली फर्मों के लिए कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ने वाली है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इससे क्लोजिंग टाइम पर लिक्विडिटी में उतार-चढ़ाव आ सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह भारतीय बाजार की मैच्योरिटी को दिखाएगा। अब बाजार की नजरें इस पर होंगी कि रेगुलेटर डेरिवेटिव सेटलमेंट के नियमों में और क्या बड़े बदलाव करता है।
