कैपिटल की ज़रूरतों में बदलाव
SEBI अब मार्केट इंटरमीडियरीज के लिए एक जैसे नियम (one-size-fits-all approach) की जगह, उनके ऑपरेशनल रिस्क के आधार पर कैपिटल की ज़रूरतें तय करेगा। यानी, ब्रोकरेज फर्म के रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से कैपिटल की ज़रूरतें तय होंगी। इससे छोटे और कम रिस्क वाले ब्रोकर्स को राहत मिलेगी और पूरे इकोसिस्टम की इंटीग्रिटी (integrity) भी बनी रहेगी। यह एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव है, जो पुराने नियमों से अलग है।
IPO में वोलैटिलिटी पर लगाम
ब्रोकर्स के कैपिटल के अलावा, SEBI अब नए लिस्ट हुए स्टॉक्स के ओपनिंग ऑक्शन (pre-open call auction) में वोलैटिलिटी को कम करने पर भी ध्यान दे रहा है। इससे IPOs में शुरुआती ट्रेडिंग के दौरान होने वाले उतार-चढ़ाव को कंट्रोल किया जा सकेगा और प्राइस डिस्कवरी (price discovery) ज़्यादा स्टेबल होगी। इसके साथ ही, म्यूचुअल फंड्स के लिए इंट्रा-डे (intraday) बरोइंग को नॉर्मलाइज करने की कोशिश की जा रही है, ताकि लिक्विडिटी मैनेजमेंट (liquidity management) स्ट्रेस्ड कंडीशंस (stressed conditions) के बजाय एक रेगुलर प्रैक्टिस बन सके। ये सब ऐसे समय में हो रहा है जब इंडिया का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन (market capitalization) जीडीपी का लगभग 128% तक पहुंच गया है।
सिस्टमैटिक रिस्क का ख़तरा
हालांकि, इन सुधारों के बीच एक चिंता यह भी है कि निवेशकों की संख्या 14.5 करोड़ तक पहुंच गई है। रिटेल इन्वेस्टर्स पर आधारित ग्रोथ, मार्केट को अचानक गिरावट के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बना सकती है, खासकर अगर महंगाई या इकोनॉमिक स्लोडाउन (economic slowdown) के कारण हाउसहोल्ड सेविंग्स के पैटर्न में बदलाव आता है। इसके अलावा, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) को तेज़ी से ऑनबोर्ड करने से ग्लोबल मैक्रो वोलैटिलिटी (global macro volatility) का खतरा बढ़ सकता है। रेगुलेटरी इतिहास बताता है कि कभी-कभी नियमों को आसान बनाने से ओवरसाइट गैप्स (oversight gaps) पैदा हो सकते हैं। अगर इंट्रा-डे बरोइंग जैसे टूल्स का गलत इस्तेमाल हुआ, तो यह लिक्विडिटी क्रंच (liquidity crunch) को बढ़ा सकता है।
आगे का रास्ता
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के साथ मिलकर कॉर्पोरेट बॉन्ड इंडेक्स डेरिवेटिव्स (corporate bond index derivatives) लाने की तैयारी, डेट मार्केट (debt market) को और गहरा करने का संकेत है। यह ज़रूरी है क्योंकि मार्केट अब सिर्फ इक्विटी (equity) में सेविंग्स से आगे बढ़कर डायवर्सिफाइड एसेट एलोकेशन (diversified asset allocation) की ओर बढ़ रहा है। जैसे-जैसे रेगुलेटर फ्रिक्शन (friction) कम करने पर फोकस करेगा, कैपिटल मार्केट्स की एफिशिएंसी (efficiency) इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए ज़रूरी हो जाएगी।
