SEBI ने अगस्त 2026 में पेश किए गए Closing Auction Session के नियमों की समीक्षा शुरू कर दी है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स से मिले **3,500** फीडबैक के बाद रेगुलेटर एक्सपायरी डे पर होने वाली वोलेटिलिटी और सेटलमेंट की दिक्कतों को दूर करने की तैयारी में है।
नियमों में बदलाव क्यों जरूरी?
अगस्त 2026 में सभी F&O शेयरों के लिए लागू किए गए इस नए फ्रेमवर्क के बाद से बाजार में प्राइस डिस्कवरी तो बेहतर हुई है, लेकिन एक्सपायरी के दिन NSE और BSE के बेंचमार्क्स में बढ़ती कीमतों की असमानता (Price Divergence) ने ट्रेडर्स की चिंता बढ़ा दी है। रेगुलेटर को मिले 3,500 से ज्यादा कमेंट्स में मुख्य रूप से सेटलमेंट के दौरान आने वाले गैप्स और बढ़ती वोलेटिलिटी का मुद्दा उठाया गया है।
क्या बदलाव हो सकते हैं?
SEBI अब डेरिवेटिव सेटलमेंट मेथोडोलॉजी में बदलाव पर विचार कर रहा है। चर्चा है कि रेगुलेटर VWAP (Volume-Weighted Average Price) के नए मॉडल के साथ पुराने डेटा को ब्लेंड (Blend) कर सकता है, या फिर कुछ समय के लिए पुरानी CTS-ओनली सेटलमेंट प्रक्रिया को वापस लाया जा सकता है। इसका मकसद सिस्टम में पारदर्शिता बनाए रखते हुए सेटलमेंट प्रोसेस को स्टेबल करना है।
बॉन्ड मार्केट के लिए नई खबर
इसी बीच, फिक्स्ड-इनकम मार्केट को गहराई देने के लिए NSE को कॉर्पोरेट बॉन्ड इंडेक्स पर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट लॉन्च करने की मंजूरी मिल गई है। यह कदम बाजार में हेजिंग (Hedging) और लिक्विडिटी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है।
आने वाले दिनों में SEBI द्वारा जारी होने वाला ऑफिशियल सर्कुलर यह तय करेगा कि आगे सेटलमेंट कैसे होगा। पैसिव फंड्स और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स की नजरें अब इन्हीं गाइडलाइन्स पर टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर उनकी ट्रेडिंग स्ट्रैटेजी पर पड़ेगा।
