SEBI ने मार्केट में प्राइस डिस्कवरी को बेहतर बनाने के लिए डेरिवेटिव सेटलमेंट्स को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन से अलग कर दिया है। **7 दिसंबर** से लागू होने वाले इस नए नियम का सीधा फायदा पैसिव निवेशकों को मिलेगा, जिससे कैश मार्केट में अस्थिरता कम होगी।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में बड़ा बदलाव किया है। अब 7 दिसंबर से एक्सपायर होने वाले इंडेक्स और स्टॉक डेरिवेटिव्स का सेटलमेंट क्लोजिंग ऑक्शन के बजाय पिछले 30 मिनट के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) के आधार पर होगा। इस कदम का मुख्य मकसद कैश-मार्केट के स्टॉक्स के लिए एक स्टेबल और भरोसेमंद क्लोजिंग प्राइस तय करना है।
पैसिव इन्वेस्टमेंट का बढ़ता दौर
भारत में पैसिव इन्वेस्टमेंट का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि इंडेक्स फंड और ETF जैसे पैसिव फंड्स का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) साल 2021 में 9.8% था, जो अब बढ़कर 18.6% हो गया है। इन फंड्स को अपना पोर्टफोलियो डेली रिबैलेंस करना पड़ता है, और पहले जब इनके बड़े ऑर्डर्स डेरिवेटिव सेटलमेंट के साथ टकराते थे, तो मार्केट में बेवजह की अस्थिरता पैदा होती थी।
आगे क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल इतना ही काफी नहीं है। बेहतर लिक्विडिटी के लिए कुछ और सुझाव दिए गए हैं:
- इम्बैलेंस-ओनली ऑर्डर्स (Imbalance-only orders): इससे मार्केट बंद होने से पहले लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स को बाय और सेल ऑर्डर्स का अंतर पता चल पाएगा, जिससे कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव कम होगा।
- SLB मैकेनिज्म में खुलापन: सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) को और आसान बनाने से आर्बिट्राजर्स को मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ाने में मदद मिलेगी।
- STT पर पुनर्विचार: वर्तमान में 0.1% सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स के मार्जिन पर भारी पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस टैक्स स्ट्रक्चर की समीक्षा से मार्केट की कार्यक्षमता और बढ़ सकती है।
साल 2047 तक एक गहरे कैपिटल मार्केट के लक्ष्य को पाने के लिए, SEBI के ये बदलाव एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन लंबे समय में 'फ्रिक्शन कॉस्ट' को कम करना और मार्केट डेप्थ बढ़ाना ही असली प्राथमिकता होगी।
