SEBI अब छोटे शहरों को एक साथ लाकर 'Pooled Municipal Bonds' जारी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसका मकसद 2031 तक भारत के **₹86 लाख करोड़** के अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर गैप को पाटना और बैंकों पर निर्भरता कम करना है।
भारत 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है, जिसके लिए वाटर सप्लाई और सीवेज जैसे अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना अनिवार्य है। नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट के आंकड़ों के अनुसार, इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 2031 तक लगभग ₹86 लाख करोड़ की भारी-भरकम पूंजी की जरूरत है।
Pooled Bonds से बदलेगी तस्वीर
भारतीय म्युनिसिपल बॉन्ड मार्केट अभी भी अपने शुरुआती दौर में है। देश के कुल बॉन्ड सेल में इसका हिस्सा 1% से भी कम है, जबकि अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में यह करीब 7% है। SEBI अब एक ऐसे फ्रेमवर्क पर काम कर रहा है जहां छोटी नगरपालिकाएं अपनी जरूरतों को 'पूल' (मिलाकर) कर सकेंगी। इससे उन छोटे निकायों को भी बॉन्ड मार्केट में एंट्री मिल जाएगी, जो अकेले फंड जुटाने में असमर्थ थे।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
अब तक 22 शहरी स्थानीय निकायों ने 31 बॉन्ड जारी करके ₹4,500 करोड़ से ज्यादा जुटाए हैं। हालांकि, इस मार्केट के विस्तार के लिए संस्थागत अनुशासन (Institutional Discipline) बेहद जरूरी है। भविष्य में बॉन्ड की क्वालिटी और रिटर्न इस बात पर निर्भर करेगा कि ये निकाय अपनी फाइनेंसियल रिपोर्टिंग में कितनी पारदर्शिता रखते हैं और इंफ्रा प्रोजेक्ट्स से कितना कैश फ्लो जनरेट होता है।
यह कदम सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग के लिए बैंकों के बजाए सीधे मार्केट से फंड जुटाने पर जोर दिया जा रहा है। निवेशकों के लिए यह एक नया एसेट क्लास उभर रहा है, जिस पर नजर रखना आने वाले समय में काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।
