SEBI ने IPO के जरिए जुटाई गई रकम की निगरानी के नियमों को सख्त करने का प्रस्ताव रखा है। अब कंपनियों को फंड के इस्तेमाल की रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा, चाहे IPO का साइज कुछ भी हो।
नियम में क्या बदल रहा है?
मौजूदा नियमों के तहत, सिर्फ ₹100 करोड़ से बड़े IPO के लिए ही फंड की निगरानी अनिवार्य थी। SME एक्सचेंज पर यह लिमिट ₹50 करोड़ थी। अब SEBI इन थ्रेशहोल्ड को पूरी तरह खत्म करने की योजना बना रही है, जिससे हर कंपनी को अपने IPO फंड्स की स्वतंत्र निगरानी करानी होगी।
नई रिपोर्टिंग और कड़ा एक्शन
प्रस्तावित ढांचे के मुताबिक, मॉनिटरिंग एजेंसियों को हर तिमाही के 45 दिनों के भीतर स्टॉक एक्सचेंज में फंड यूटिलाइजेशन रिपोर्ट जमा करनी होगी। अगर कंपनियां देरी करती हैं, तो एजेंसियां सीधे एक्सचेंज को रिपोर्ट दे सकेंगी। नियमों के उल्लंघन पर कंपनियों पर भारी जुर्माना लग सकता है या प्रमोटरों की शेयर होल्डिंग को भी फ्रीज किया जा सकता है।
पारदर्शिता या फॉरेंसिक चुनौती?
SEBI का यह कदम रिटेल निवेशकों के पैसों को गलत जगह (जैसे लग्जरी एसेट्स या हॉस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट्स) में निवेश होने से बचाने के लिए है। हालांकि, बाजार के जानकार इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां, जो फंड की निगरानी करेंगी, उनके पास इतनी फॉरेंसिक क्षमता है कि वे मशीनरी या इंफ्रास्ट्रक्चर में हुए खर्चों को बारीकी से चेक कर सकें। इसके अलावा, रेटिंग एजेंसियों और कंपनियों के बीच संभावित 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' भी एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
