SEBI का बड़ा ऐलान! अब मार्जिन नियमों में हो सकता है बदलाव, निवेशकों को मिलेगा फायदा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
SEBI का बड़ा ऐलान! अब मार्जिन नियमों में हो सकता है बदलाव, निवेशकों को मिलेगा फायदा

SEBI कैश मार्केट ट्रेड्स के लिए मौजूदा 20% मार्जिन नियमों को बदलने की तैयारी में है। नए नियम के तहत, यह एक रिस्क-बेस्ड मॉडल हो सकता है, जिससे लिक्विड स्टॉक्स के लिए कैपिटल की जरूरत 10-15% तक कम हो सकती है।

Detailed Coverage

मार्जिन नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी SEBI

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कैश मार्केट में होने वाले सौदों के लिए मार्जिन कलेक्शन के नियमों में सुधार का प्लान तैयार किया है। अभी स्टॉक ब्रोकर्स को निवेशकों से हर हाल में 20% का अपफ्रंट मार्जिन लेना पड़ता है, चाहे वह स्टॉक कितना भी रिस्की क्यों न हो। लेकिन, अब SEBI इसे बदलकर रिस्क-बेस्ड फ्रेमवर्क लाने की सोच रहा है। इसका मतलब है कि अब स्टॉक की अस्थिरता (Volatility) और लिक्विडिटी के हिसाब से मार्जिन तय होगा।

निवेशकों को मिल सकती है राहत

बाजार के जानकारों का मानना है कि अगर यह नया नियम लागू होता है, तो बड़ी कंपनियों (Large-cap stocks) के लिए मार्जिन की जरूरत 10% से 15% तक कम हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कई लार्ज-कैप स्टॉक्स को क्लियरिंग कॉरपोरेशन्स कम जोखिम वाला मानती हैं, और उनका मार्जिन 12.5% तक कम हो सकता है। अभी नियमों के तहत ब्रोकर्स को फिर भी 20% मार्जिन लेना पड़ता है। नए प्रस्ताव के अनुसार, ब्रोकर्स या तो क्लियरिंग हाउस द्वारा तय किया गया असली रिस्क-बेस्ड मार्जिन या 20% की ऊपरी सीमा, जो भी कम हो, उतना ले सकेंगे। इससे निवेशकों के फंसे हुए पैसे (Blocked Capital) कम होंगे और उनके पास ट्रेडिंग के लिए ज्यादा लिक्विडिटी उपलब्ध होगी।

स्टॉक्स का क्लासिफिकेशन होगा और सख्त

SEBI केवल मार्जिन ही नहीं, बल्कि स्टॉक्स की लिक्विडिटी के क्लासिफिकेशन पर भी विचार कर रहा है। मौजूदा नियम 2005 से चले आ रहे हैं। अब SEBI ज्यादा सख्त स्टैंडर्ड लाने की सोच रहा है, जैसे कि ट्रेडिंग की फ्रीक्वेंसी बढ़ाना और इंपैक्ट कॉस्ट थ्रेशोल्ड को और कड़ा करना। यह क्लासिफिकेशन यह तय करता है कि कौन से स्टॉक्स मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) जैसी सुविधाओं का लाभ उठा पाएंगे।

कोलैटरल और रिस्क मैनेजमेंट पर भी फोकस

बाजार को और मजबूत बनाने के लिए, SEBI कोलैटरल पर कंसंट्रेशन लिमिट (Concentration Limits) लगाने पर भी विचार कर रहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ब्रोकर्स और क्लियरिंग हाउसेस किसी एक स्टॉक पर अत्यधिक निर्भर न रहें। अलग-अलग तरह की सिक्योरिटीज को कोलैटरल के रूप में स्वीकार करके, SEBI किसी खास स्टॉक के गिरने पर होने वाले सिस्टमैटिक रिस्क को कम करना चाहता है। इसके अलावा, अर्ली पे-इन (EPI) फैसिलिटी का इस्तेमाल करने वाले निवेशकों के लिए मार्जिन में और राहत देने और शॉर्ट-सेलिंग को बढ़ावा देने जैसे उपायों पर भी चर्चा हो रही है।

निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे SEBI या स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा जारी किए जाने वाले सर्कुलर पर नजर रखें ताकि इन बदलावों के लागू होने की टाइमलाइन और किन स्टॉक्स पर इसका असर पड़ेगा, इसकी जानकारी मिल सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.