SEBI ने एक नया प्रस्ताव पेश किया है जिसके तहत Mutual Funds को कैश ट्रेड में Net Settlement की सुविधा मिल सकती है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य एसेट मैनेजरों की वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को कम करना और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बनाना है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 3 सितंबर 2026 को एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसमें Mutual Fund स्कीम्स के लिए कैश मार्केट में 'नेट सेटलमेंट' (Net Settlement) लागू करने का सुझाव दिया गया है।
अभी क्या है व्यवस्था?
फिलहाल Mutual Funds अपने ट्रेड को 'ग्रॉस बेसिस' (Gross Basis) पर सेटल करते हैं। इसका मतलब है कि हर खरीदारी और बिक्री को अलग-अलग ट्रांजैक्शन माना जाता है, जिसके लिए फंड हाउसों को भारी मात्रा में कैश ब्लॉक करना पड़ता है। प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत, फंड हाउस एक ही सेटलमेंट साइकिल में समान सिक्योरिटी के लिए अपनी खरीदारी और बिक्री को आपस में एडजस्ट (Offset) कर सकेंगे।
क्यों है यह बदलाव जरूरी?
यह सुविधा पहले से ही फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) को उपलब्ध है। इस प्रस्ताव के जरिए SEBI घरेलू म्यूचुअल फंड्स को भी समान अवसर देना चाहता है। इससे इंडेक्स रीबैलेंसिंग या बड़े रिडेम्पशन के समय मार्केट में आने वाली अड़चनें कम होंगी।
सुरक्षा और नियम
इस नए बदलाव में जोखिम को कम करने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं:
- सिक्योरिटीज़ की डिलीवरी 'ग्रॉस बेसिस' पर ही जारी रहेगी।
- नेट सेटलमेंट की सुविधा सिर्फ इंडिविजुअल 'म्यूचुअल फंड स्कीम' तक ही सीमित रहेगी, ताकि फंड-लेवल की अकाउंटिंग में कोई गड़बड़ी न हो।
SEBI ने इस पर 24 सितंबर 2026 तक जनता से सुझाव और राय मांगी है। जानकारों का मानना है कि इससे कैपिटल का बेहतर उपयोग हो पाएगा और फंड मैनेजर्स को फालतू कैश ब्लॉक करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
