SEBI ने एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसके तहत अब सभी मार्केट इंटरमीडियरीज के प्रिंसिपल ऑफिसर्स को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) सर्टिफिकेशन पूरा करना होगा। इसका मकसद कंप्लायंस के मानकों को सख्त बनाना और संदिग्ध ट्रांजैक्शन की पहचान में सुधार करना है।
नियम में क्या है बदलाव?
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कैपिटल मार्केट्स की निगरानी को और मजबूत करने का प्लान तैयार किया है। अब स्टॉकब्रोकर्स, म्यूचुअल फंड हाउस और डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट्स के प्रिंसिपल ऑफिसर्स को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) और काउंटरिंग द फाइनेंसिंग ऑफ टेररिज्म (CFT) सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य होगा। ये अधिकारी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस और फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND) के बीच मुख्य कड़ी का काम करते हैं।
क्यों लिया गया यह फैसला?
फिलहाल, कंपनियों को सिर्फ अपने स्टाफ को ट्रेनिंग देने का नियम है, लेकिन कोई औपचारिक सर्टिफिकेशन नहीं है जो अधिकारी की काबिलियत को साबित कर सके। SEBI अब NISM-Series-XXIV सर्टिफिकेशन को अनिवार्य बनाकर इस कमी को दूर करना चाहता है। यह बदलाव एक यूनिफॉर्म नॉलेज बेंचमार्क तय करेगा, जिससे संदिग्ध लेनदेन को रोकने में मदद मिलेगी।
मार्केट इंटरमीडियरीज पर असर
यह कदम ब्रोकर्स और एसेट मैनेजमेंट फर्म्स के लिए कंप्लायंस का बोझ बढ़ाएगा। नियमों के लागू होने के बाद, फर्मों को 6 महीने के भीतर अपने मौजूदा प्रिंसिपल ऑफिसर्स को सर्टिफाई कराना होगा। नए नियुक्त अधिकारियों के पास भी जॉइनिंग से 6 महीने का ही समय होगा। हालांकि, यह एडमिनिस्ट्रेटिव काम बढ़ा सकता है, लेकिन इससे मार्केट में अवैध मनी फ्लो पर लगाम लगेगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।
पारदर्शिता के लिए क्यों जरूरी है?
प्रिंसिपल ऑफिसर का रोल काफी अहम होता है। वे कस्टमर ड्यू डिलिजेंस, बेनिफिशियल ओनरशिप और रिस्क कैटेगराइजेशन के लिए जिम्मेदार होते हैं। यदि ये अधिकारी ठीक से ट्रेंड नहीं हैं, तो संदिग्ध गतिविधियों का पता न चल पाने का रिस्क बढ़ जाता है, जिससे कंपनी पर जुर्माना लगने का खतरा रहता है। SEBI का यह कदम निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए बाजार को और अधिक सुरक्षित बनाने की एक कोशिश है।
