डेरिवेटिव्स मार्केट को मिलेगा बूस्ट
SEBI की ओर से किए जा रहे ये प्रस्तावित बदलाव भारतीय डेरिवेटिव्स मार्केट को और ज्यादा एफिशिएंट और ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। रेगुलेटर का लक्ष्य एक्सचेंजेस और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन्स के लिए ऑपरेशनल दिक्कतों को कम करना है, जिससे मार्केट की लिक्विडिटी और डेप्थ (Depth) बढ़ सके।
कंप्लायंस होगा आसान, बिजनेस होगा स्मूथ
इन सुधारों के केंद्र में मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों (MIIs) के लिए 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देना है। सबसे अहम प्रस्तावों में से एक है कॉमोडिटी डेरिवेटिव्स के लिए 'क्लोज टू द मनी' (CTM) ऑप्शन सीरीज मैकेनिज्म को हटाना। इस बदलाव से भारतीय मार्केट ग्लोबल प्रैक्टिसेस के साथ सिंक (Sync) होगा, जिससे ट्रेडर्स के लिए ऑप्शन एक्सरसाइज (Exercise) करना आसान होगा और ऑप्शन सेलर्स के लिए भी अस्पष्टता कम होगी।
इसके साथ ही, गैर-कृषि कमोडिटीज के लिए प्रोडक्ट एडवाइजरी कमेटी (PAC) की मीटिंग्स की फ्रीक्वेंसी (Frequency) को साल में दो बार से घटाकर एक बार कर दिया जाएगा। यह फीडबैक पर आधारित है कि इन कमोडिटीज के कॉन्ट्रैक्ट स्पेसिफिकेशन्स (Contract Specifications) में शायद ही कभी बदलाव होता है और मीटिंग्स में उपस्थिति भी कम रहती है।
भारत का बढ़ता डेरिवेटिव्स मार्केट और ग्लोबल ट्रेंड्स
हाल के वर्षों में भारत के कॉमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट में काफी ग्रोथ देखने को मिली है, जिसका एवरेज डेली टर्नओवर (Average Daily Turnover) लगातार बढ़ा है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MCX) ने भी ट्रेडिंग वॉल्यूम और रिटेल पार्टिसिपेशन (Retail Participation) बढ़ने से अच्छे मुनाफे की रिपोर्ट दी है। SEBI के ये रिफॉर्म्स इसी मोमेंटम (Momentum) को और आगे बढ़ाने के लिए हैं। ग्लोबल स्तर पर, भारत और ब्राजील को तेजी से बढ़ते डेरिवेटिव्स मार्केट्स के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें भारत के इक्विटी ऑप्शंस (Equity Options) ग्लोबल ट्रेडिंग वॉल्यूम में बड़ा योगदान देते हैं।
संभावित जोखिम और चुनौतियाँ
हालांकि SEBI का मकसद सरलीकरण करना है, लेकिन इन प्रस्तावित बदलावों में कुछ संभावित जोखिम भी हैं। पोजीशन लिमिट मॉनिटरिंग (Position Limit Monitoring) का काम क्लियरिंग कॉर्पोरेशन्स को सौंपने से ओवरसाइट (Oversight) में चुनौतियां आ सकती हैं, अगर जिम्मेदारियों को ठीक से परिभाषित न किया जाए। अप्रत्याशित घटनाओं के दौरान कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायरी डेट्स (Contract Expiry Dates) को आगे बढ़ाना, कन्फ्यूजन से बचने के लिए सख्त कम्युनिकेशन की मांग करता है।
SEBI के अतीत के रेगुलेटरी बदलावों, जैसे इक्विटी डेरिवेटिव्स रूल्स को कड़ा करने से, ट्रेडिंग वॉल्यूम और ब्रोकर्स (Brokers) के रेवेन्यू (Revenue) में भारी गिरावट देखी गई थी। एक जोखिम यह भी है कि बहुत ज्यादा सरलीकृत नियम कुछ क्षेत्रों में ओवरसाइट को कम कर सकते हैं, जिससे मजबूत सर्विलांस (Surveillance) के बिना सिस्टमिक रिस्क (Systemic Risk) बढ़ सकता है। CTM फ्रेमवर्क को हटाने से, जो ग्लोबल नॉर्म्स के अनुरूप है, उन ट्रेडर्स के लिए अप्रत्याशित समस्याएं पैदा हो सकती हैं जो मौजूदा सिस्टम के आदी हैं।
आगे क्या?
SEBI इन प्रस्तावों पर 4 जून तक जनता से कमेंट्स (Comments) मांग रहा है, जो कि लागू होने से पहले स्टेकहोल्डर (Stakeholder) इनपुट के प्रति रेगुलेटर की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। रेगुलेटर का दृष्टिकोण मार्केट डेवलपमेंट को स्थिरता के साथ संतुलित करना है। बाजार सहभागियों की नजर इस बात पर रहेगी कि CTM मैकेनिज्म और PAC मीटिंग्स में बदलावों से ट्रेडिंग और MII की एफिशिएंसी कैसे प्रभावित होती है।
