SEBI ने एक नया कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसके तहत स्टॉक एक्सचेंज और डिपॉजिटरी को बिना पूर्व नियामक मंजूरी के अपने बिजनेस का विस्तार करने की छूट मिलेगी।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (MIIs) के काम करने के तरीके को बदलने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है। नए फ्रेमवर्क के अनुसार, अब स्टॉक एक्सचेंज और डिपॉजिटरी डेटा एनालिटिक्स, टेक्नोलॉजी सर्विसेज या अन्य मंजूरशुदा बिजनेस में सीधे प्रवेश कर सकेंगे। अभी तक इसके लिए हर बार रेगुलेटर से मंजूरी लेनी पड़ती थी, लेकिन अब इसे 'ऑटोमैटिक अप्रूवल रूट' के दायरे में लाया जा रहा है।
बिजनेस विस्तार के नियम और सीमाएं
रेगुलेटर का मुख्य उद्देश्य नौकरशाही की बाधाओं को कम करना है ताकि एक्सचेंज अपनी तकनीक का इस्तेमाल कर नई रेवेन्यू स्ट्रीम्स तैयार कर सकें। हालांकि, मार्केट की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए SEBI ने कुछ कड़े फाइनेंशियल बैरियर भी लगाए हैं:
- इन्वेस्टमेंट लिमिट: ऑटोमैटिक रूट के तहत निवेश की सीमा पिछले साल की नेट वर्थ के 5% या रेगुलेटरी मिनिमम नेट वर्थ, जो भी कम हो, तक सीमित होगी।
- नेट वर्थ क्राइटेरिया: निवेश के बाद भी संस्था की नेट वर्थ अनिवार्य न्यूनतम स्तर की 1.5 गुना बनी रहनी चाहिए।
क्लीयरिंग कॉरपोरेशन को नहीं मिलेगी छूट
इस नई सुविधा से क्लीयरिंग कॉरपोरेशन को बाहर रखा गया है, क्योंकि ट्रेड सेटलमेंट और सिस्टमैटिक रिस्क मैनेज करने में उनकी भूमिका बेहद संवेदनशील होती है। बाकी संस्थाओं के लिए अब जिम्मेदारी उनके बोर्ड पर होगी कि वे सुनिश्चित करें कि कमर्शियल विस्तार से बाजार की पारदर्शिता पर कोई असर न पड़े।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी है?
अब इन संस्थाओं को अपने कोर बिजनेस और नए वेंचर्स के बीच संसाधनों का सही तालमेल बिठाना होगा। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां अपना पैसा टेक्नोलॉजी अपग्रेड पर खर्च कर रही हैं या गैर-जरूरी विस्तार पर। इसकी पारदर्शिता के लिए छह-महीने की रिपोर्टिंग अनिवार्य की गई है। इस प्रस्ताव पर आम जनता 12 नवंबर, 2026 तक अपनी राय दे सकती है।
