SEBI ने एक नया कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसके तहत स्टॉक एक्सचेंजों और डिपॉजिटरीज को बिना पूर्व अनुमति के कुछ बिजनेस गतिविधियों को शुरू करने की छूट दी जाएगी। इसका मकसद ऑपरेशंस को आसान बनाना है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है जो मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (MIIs) यानी स्टॉक एक्सचेंजों और डिपॉजिटरीज के काम करने के तरीके को बदल सकता है। अभी इन संस्थाओं को हर छोटे-बड़े निवेश या फैसले के लिए रेगुलेटर की मंजूरी लेनी पड़ती है, जिसमें काफी समय बर्बाद होता है।
क्या है नया प्रस्ताव?
नया ढांचा दो रास्तों पर काम करेगा। पहला, रेगुलेटर द्वारा अनिवार्य पहल और ग्रुप कंपनियों के बीच शेयरों का ट्रांसफर। दूसरा, उन गतिविधियों के लिए जो पहले से मंजूर की जा चुकी हैं। इसका मकसद कंपनियों का कंप्लायंस बोझ कम करना है।
सुरक्षा के लिए सख्त नियम (Guardrails)
स्वतंत्रता मिलने के बावजूद जोखिम कम करने के लिए कड़ी शर्तें जोड़ी गई हैं:
- फंड का सालाना निवेश नेट वर्थ के 5% या रेगुलेटरी मिनिमम से अधिक नहीं हो सकता।
- निवेश के बाद भी संस्था की नेट वर्थ रेगुलेटरी जरूरत से कम से कम 1.5 गुना बनी रहनी चाहिए।
- हर निवेश के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मंजूरी जरूरी होगी।
- पारदर्शिता के लिए 30 दिनों के भीतर छमाही डिस्क्लोजर देना अनिवार्य होगा।
यह बदलाव BSE और Central Depository Services जैसी लिस्टेड कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है। रेगुलेटर ने 12 नवंबर, 2026 तक इस पर आम जनता से राय मांगी है।
