SEBI ने फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के लिए कंप्लायंस नियमों को सरल बनाने की योजना बनाई है। इसका मुख्य मकसद भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ाना है।
विदेशी निवेशकों के लिए आसान राह
SEBI जल्द ही एक कंसल्टेशन पेपर जारी करने वाला है, जिसका लक्ष्य FPIs के लिए कंप्लायंस के बोझ को कम करना है। ग्लोबल मार्केट के मुकाबले भारत में निवेश की प्रक्रिया को सरल बनाकर रेगुलेटर विदेशी पूंजी को तेजी से आकर्षित करना चाहता है, ताकि मार्केट की मजबूती और पारदर्शिता बनी रहे।
स्टॉक एक्सचेंज की सेल्फ-लिस्टिंग पर संशय
लंबे समय से चर्चा में रहे 'स्टॉक एक्सचेंज की सेल्फ-लिस्टिंग' के मुद्दे पर SEBI का रुख अभी भी सतर्क है। रेगुलेटर का कहना है कि यह प्रस्ताव अभी ठंडे बस्ते में है। इसकी मुख्य वजह 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' है, क्योंकि एक्सचेंज खुद रेगुलेटर भी हैं और मार्केट ऑपरेटर भी। भविष्य में अगर इस पर कोई फैसला होता है, तो सख्त सुरक्षा मानकों की जरूरत होगी ताकि रेगुलेटरी निष्पक्षता बनी रहे।
क्षेत्रीय एक्सचेंजों के लिए सख्त शर्तें
कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज जैसे बंद पड़े क्षेत्रीय एक्सचेंजों को दोबारा शुरू करने को लेकर SEBI ने साफ किया है कि उनकी व्यावसायिक व्यवहार्यता (commercial viability) पर उसे संदेह है। आज के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग दौर में फिजिकल एक्सचेंज का मॉडल पुराना हो चुका है। अगर कोई फिर से लाइसेंस मांगता है, तो उसे AI-आधारित खतरों से निपटने की क्षमता और पर्याप्त ट्रेडिंग वॉल्यूम का ठोस सबूत देना होगा।
भारतीय मार्केट का बढ़ता दायरा
देश का फाइनेंशियल सिस्टम तेजी से बढ़ रहा है। पिछले एक दशक में मार्केट कैप-टू-GDP रेशियो 69% (वित्त वर्ष 2016) से बढ़कर 130% हो गया है। वहीं, कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट का साइज भी ₹61 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है। आने वाले समय में रेगुलेटर का पूरा जोर नए फाइनेंसिंग साधनों को विकसित करने और रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर होगा।
