भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) शॉर्ट सेलिंग यानी बिना किसी शेयर को खरीदे उसे बेचने की सुविधा को लेकर बड़े बदलावों की योजना बना रहा है। इस नए नियम के तहत, शॉर्ट सेलिंग के लिए योग्य स्टॉक्स की संख्या लगभग दोगुनी हो सकती है और साथ ही इसके लिए जरूरी कोलैटरल (मार्जिन) की भी कटौती की जा सकती है।
शॉर्ट सेलिंग पर SEBI का फोकस
SEBI का मकसद कैश इक्विटी मार्केट में लिक्विडिटी (तरलता) और एफिशिएंसी (दक्षता) को बढ़ाना है। अभी देश में बहुत कम कंपनियां शॉर्ट सेलिंग के दायरे में आती हैं। SEBI इस संख्या को लगभग दोगुना करने पर विचार कर रहा है, जिससे ज्यादा निवेशक इस सुविधा का लाभ उठा सकें।
कोलैटरल की ज़रूरत होगी कम
एक बड़ा कदम यह भी है कि शॉर्ट सेलिंग के लिए जरूरी कोलैटरल की मात्रा को कम किया जाए। वर्तमान में, भारत में निवेशकों को शॉर्ट सेलिंग के लिए अक्सर 130% तक का कोलैटरल देना पड़ता है, जो कि विकसित देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है (जहां यह लगभग 100% होता है)। इस कटौती से शॉर्ट सेलिंग अधिक किफायती और सुलभ हो जाएगी।
डेरिवेटिव्स से कैश मार्केट की ओर
SEBI की इस पहल का एक बड़ा उद्देश्य रिटेल निवेशकों को ऊंचे जोखिम वाले डेरिवेटिव्स सेगमेंट से हटाकर कैश मार्केट की ओर लाना है। डेरिवेटिव्स में तेज उतार-चढ़ाव से भारी नुकसान का खतरा रहता है, जबकि कैश मार्केट में वास्तविक शेयर खरीदने-बेचने से जोखिम कम होता है। भारत में लगभग 90% रिटेल ट्रेडर्स डेरिवेटिव्स में नुकसान उठाते हैं।
कौन से स्टॉक्स होंगे शामिल?
फिलहाल, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर लिस्टेड लगभग 2,600 कंपनियों में से सिर्फ 176 कंपनियां ही सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) मैकेनिज्म के तहत शॉर्ट सेलिंग के लिए योग्य हैं। यह योग्यता न्यूनतम मार्केट कैप और ट्रेडिंग वॉल्यूम जैसे कड़े पैमानों पर आधारित है। SEBI इन पैमानों की समीक्षा कर रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा कंपनियों को इस सुविधा में लाया जा सके। इन बदलावों का अंतिम रूप 2026 के अंत तक जारी होने की उम्मीद है।
