SEBI का बड़ा कदम: विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए ट्रेडिंग नियमों में होगा बदलाव!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
SEBI का बड़ा कदम: विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए ट्रेडिंग नियमों में होगा बदलाव!

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) विदेशी इक्विटी में **17** साल के निचले स्तर को पलटने के लिए ट्रेडिंग नियमों में एक बड़े बदलाव की योजना बना रहा है। प्रस्तावित सुधारों में कोलेटरल की आवश्यकताएं कम करना और वैश्विक इंडेक्स मानकों के अनुरूप लंबी अवधि के डेरिवेटिव के लिए प्रोत्साहन शामिल हैं।

विदेशी निवेश में आई भारी गिरावट

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की हिस्सेदारी 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। इस गिरावट को थामने और विदेशी पूंजी को वापस लाने के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) एक बड़ी योजना पर काम कर रहा है। SEBI जल्द ही ट्रेडिंग नियमों में महत्वपूर्ण बदलावों का ऐलान कर सकता है।

क्या हैं प्रस्ताव?

SEBI का मुख्य लक्ष्य विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार को और अधिक आकर्षक और सुलभ बनाना है। इसके लिए, नियामक कैश इक्विटी ट्रेडों के लिए कोलेटरल आवश्यकताओं को 15% से 20% तक कम करने पर विचार कर रहा है। इससे संस्थागत निवेशकों के लिए तरलता (liquidity) बढ़ेगी।

इसके अलावा, SEBI लंबी अवधि के डेरिवेटिव्स (derivatives) अनुबंधों के उपयोग को बढ़ावा देने की भी योजना बना रहा है। फिलहाल, भारत में शॉर्ट-टर्म डेरिवेटिव्स की तुलना में लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव्स का उपयोग कम होता है, जिसका एक मुख्य कारण हाई कोलेटरल कॉस्ट है। इन सुधारों से स्टॉक शॉर्टिंग (stock shorting) को बढ़ावा मिलेगा और उधार लेने व देने के लिए उपलब्ध शेयरों का पूल बढ़ेगा। SEBI का इरादा भारत के बाजार ढांचे को दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे विकसित देशों के मानकों के करीब लाना है।

रेगुलेटरी आधुनिकीकरण पर SEBI का जोर

यह कदम SEBI द्वारा बाजार आधुनिकीकरण की दिशा में उठाए जा रहे कदमों की एक श्रृंखला का हिस्सा है। हाल ही में, बाजार में F&O-एनेबल्ड स्टॉक्स के लिए नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू की गई थी, जो 3 अगस्त, 2026 से प्रभावी है। साथ ही, ओपन-मार्केट शेयर बायबैक (share buybacks) से संबंधित नियमों को 1 अगस्त, 2026 से 66 दिनों की नई पूर्णता अवधि के साथ फिर से शुरू किया गया है।

रिटेल से इंस्टीट्यूशनल पर फोकस

इन सुधारों का एक प्रमुख उद्देश्य बाजार में भागीदारी को पुनर्संतुलित करना है। वर्तमान में, भारत की ट्रेडिंग गतिविधि में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी 35% से अधिक है, जो कई विकसित बाजारों की तुलना में काफी अधिक है। SEBI का नीतिगत ध्यान पिछले दो वर्षों से सट्टा डेरिवेटिव ट्रेडिंग को नियंत्रित करने पर रहा है, क्योंकि इससे अक्सर रिटेल निवेशकों को भारी नुकसान होता है। नियामक संस्थागत और पेशेवर निवेशकों के पक्ष में बाजार संरचना को प्रोत्साहित करके एक अधिक स्थिर दीर्घकालिक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की कोशिश कर रहा है।

तत्काल चुनौतियां

हालांकि ये सुधार बाजार के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन ये वित्तीय प्रणाली के लिए तत्काल चुनौतियां भी पैदा करते हैं। बाजार प्रतिभागी (market participants) हाल ही में लागू की गई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के साथ तालमेल बिठा रहे हैं, जिस पर मूल्य हेरफेर (price manipulation) की क्षमता और अस्थिरता (volatility) की एकाग्रता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बदलते नियामक ढांचे का अनुपालन करना ब्रोकर्स और क्लियरिंग हाउस के लिए परिचालन दबाव (operational pressure) भी पैदा कर सकता है। इसके अलावा, रुपये का अवमूल्यन (depreciation) और आयात बिलों का बढ़ना जैसे मैक्रोइकॉनॉमिक हेडविंड्स (macroeconomic headwinds) विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रभावित करना जारी रखेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.