SEBI का बड़ा दांव: अब ₹25 लाख में 'MF-Only' PMS का मौका, डिस्ट्रीब्यूटर्स पर खतरा?

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AuthorMehul Desai|Published at:
SEBI का बड़ा दांव: अब ₹25 लाख में 'MF-Only' PMS का मौका, डिस्ट्रीब्यूटर्स पर खतरा?

SEBI ने एक नई 'MF-only' पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) कैटेगरी का प्रस्ताव दिया है, जिसमें निवेश की न्यूनतम राशि ₹25 लाख रखी गई है। इस कदम से ज़्यादा धनी लोगों के लिए प्रोफेशनल इन्वेस्टमेंट सर्विसेज का दायरा बढ़ेगा, लेकिन यह म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है। उन्हें कमीशन से होने वाली आमदनी का नुकसान हो सकता है अगर क्लाइंट्स इन फी-बेस्ड मॉडल में शिफ्ट होते हैं।

SEBI की नई चाल: 'MF-Only' PMS का प्रस्ताव

सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने जुलाई 2026 में एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसमें म्यूचुअल फंड (MF) निवेश के लिए खास तौर पर बनाई गई पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) की नई कैटेगरी का प्रस्ताव है। इस 'MF-only' PMS फ्रेमवर्क का मकसद मास-एफ्लुएंट (Mass-Affluent) निवेशकों को कम एंट्री कॉस्ट पर प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजमेंट की सुविधा देना है।

निवेश की सीमा में बड़ी कटौती

इस नए प्रस्ताव के तहत, इस कैटेगरी के लिए न्यूनतम निवेश की सीमा ₹25 लाख तय की गई है। यह पारंपरिक PMS प्रोडक्ट्स के लिए ज़रूरी ₹50 लाख की सीमा से काफी कम है। साथ ही, SEBI ने यह भी सुझाव दिया है कि इन पोर्टफोलियो को मैनेज करने वाली कंपनियों के लिए कम से कम ₹2 करोड़ की नेट वर्थ (Net Worth) होनी चाहिए। इस कदम का उद्देश्य रिटेल म्यूचुअल फंड निवेश और हाई-एंड डिस्क्रिशनरी पोर्टफोलियो मैनेजमेंट के बीच की खाई को पाटना है।

डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए बड़ी चुनौती

हालांकि, म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए यह प्रस्ताव उनके मौजूदा बिजनेस मॉडल के लिए एक बड़ा झटका है। फिलहाल, कई डिस्ट्रीब्यूटर्स 'रेगुलर' म्यूचुअल फंड प्लान्स से कमीशन कमाते हैं, जो फंड्स के एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) में शामिल होता है। इसके विपरीत, एक MF-only PMS केवल 'डायरेक्ट' म्यूचुअल फंड प्लान्स में ही निवेश करेगा, जिनमें डिस्ट्रीब्यूटर्स को कोई कमीशन नहीं मिलता। इसके बजाय, पोर्टफोलियो मैनेजर क्लाइंट से सीधे मैनेजमेंट फीस लेगा, जिसे SEBI ने एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) के 2.5% तक सीमित रखने का प्रस्ताव दिया है।

'डबल स्क्वीज़' का खतरा

यह बदलाव डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए एक 'डबल स्क्वीज़' (Double Squeeze) की स्थिति पैदा करता है। पहला, निवेशक पहले से ही कॉस्ट बचाने के लिए डायरेक्ट प्लान्स चुन रहे हैं, जिससे डिस्ट्रीब्यूटर्स को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। दूसरा, अगर क्लाइंट्स रेगुलर म्यूचुअल फंड स्कीम्स से निकलकर MF-only PMS स्ट्रक्चर में चले जाते हैं, तो डिस्ट्रीब्यूटर अपनी लगातार मिलने वाली कमीशन इनकम पूरी तरह खो देगा। फी-बेस्ड मॉडल की ओर यह तेजी डिस्ट्रीब्यूटर्स को सोचने पर मजबूर करेगी कि वे क्लाइंट्स को कैसे वैल्यू ऐड करें, यानी कमीशन-आधारित कमाई से हटकर एडवाइजरी फीस की ओर बढ़ें।

हितों के टकराव को रोकने के उपाय

हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकने के लिए, रेगुलेटर ने प्रस्ताव में एक सख्त 'फायरवॉल' (Firewall) प्रोविज़न शामिल किया है। जो कंपनियां म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर और MF-PMS दोनों का काम करती हैं, वे एक ही क्लाइंट को दोनों व्यवसायों के माध्यम से सेवा नहीं दे सकेंगी। उन्हें या तो एक मॉडल चुनना होगा या संचालन में सख्त अलगाव बनाए रखना होगा। इस नियम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कंपनियां अपनी दौलत बढ़ने पर कमीशन देने वाले क्लाइंट्स को सीधे उच्च-शुल्क वाले PMS में माइग्रेट न करें।

निवेशकों के लिए आर्थिक दांव

निवेशकों को भी आर्थिक दांव पर विचार करना चाहिए। जहां MF-only PMS प्रोफेशनल निगरानी और एक्टिव मैनेजमेंट की सुविधा देता है, वहीं यह क्लाइंट के लिए समग्र लागत बढ़ा सकता है। निवेशक को अंतर्निहित म्यूचुअल फंड के एक्सपेंस रेशियो के साथ-साथ पोर्टफोलियो मैनेजर द्वारा ली जाने वाली अतिरिक्त मैनेजमेंट फीस का भी भुगतान करना होगा। इन नियमों का अंतिम कार्यान्वयन डिस्ट्रीब्यूशन इंडस्ट्री के लिए एक महत्वपूर्ण घटना होगी, और निवेशक यह देख सकते हैं कि कंपनियां इन नए रेगुलेटरी बाउंड्रीज का पालन करने के लिए अपने बिजनेस मॉडल को कैसे समायोजित करती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.