SEBI: लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव ट्रेड्स के लिए मार्जिन घटाने की तैयारी, स्पेकुलेशन पर लगेगी लगाम

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AuthorNeha Patil|Published at:
SEBI: लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव ट्रेड्स के लिए मार्जिन घटाने की तैयारी, स्पेकुलेशन पर लगेगी लगाम

SEBI अब लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए मार्जिन की जरूरतों को कम करने पर विचार कर रहा है। इसका मकसद निवेशकों को शॉर्ट-टर्म रिस्की ट्रेडिंग से दूर कर सस्टेनेबल ट्रेडिंग की ओर प्रोत्साहित करना है।

मार्जिन में बदलाव के पीछे की सोच

SEBI अब फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए मार्जिन फ्रेमवर्क की समीक्षा कर रहा है। हाल ही में SBI बैंकिंग एंड इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने बताया कि यह कदम मार्केट में शॉर्ट-टर्म स्पेकुलेशन को कम करने और सस्टेनेबल कैपिटल एलोकेशन को बढ़ावा देने के लिए उठाया जा रहा है। भारतीय मार्केट में रिटेल पार्टिसिपेशन के तेजी से बढ़ने के बीच यह एक बड़ा रेगुलेटरी बदलाव है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

आंकड़े बताते हैं कि फ्यूचर्स और ऑप्शंस में ट्रेड करने वाले अधिकांश व्यक्तिगत निवेशकों को नुकसान होता है। वर्तमान सिस्टम में शॉर्ट-टर्म और वीकली एक्सपायरी कॉन्ट्रैक्ट्स पर हाई लेवरेज मिलता है, जो निवेशकों के लिए काफी रिस्की साबित होता है। SEBI का मानना है कि लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स पर मार्जिन लागत कम करने से निवेशकों को अपनी इक्विटी पोर्टफोलियो को हेज (Hedge) करने में आसानी होगी और वे बेवजह की इंट्राडे उतार-चढ़ाव से बच सकेंगे।

मार्केट स्ट्रक्चर में होगा सुधार

रेगुलेटर का साफ कहना है कि यह कोई 'डिरिगुलेशन' नहीं है, बल्कि मार्केट में मौजूद घर्षण (friction) को कम करने की कोशिश है ताकि निवेशक लॉन्ग-टर्म विजन के साथ निवेश कर सकें। इससे भारतीय फाइनेंशियल मार्केट में विदेशी और घरेलू दोनों तरह की पूंजी अधिक सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से आएगी।

अब इंडस्ट्री को SEBI के आधिकारिक सर्कुलर का इंतजार है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन से कॉन्ट्रैक्ट्स पर मार्जिन कम किया जाता है और ब्रोकरेज हाउस इसके लिए अपने रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम में कैसे बदलाव करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.