SEBI ने 'Settlement of Administrative and Civil Proceedings Regulations, 2026' लागू कर दिए हैं। नए नियमों से सेटलमेंट की रकम तय करने का फॉर्मूला बदल गया है और छोटे विवादों के लिए फास्ट-ट्रैक रास्ता खुल गया है, जिससे कंपनियों के कानूनी संकट जल्दी खत्म होंगे।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने प्रशासनिक और नागरिक विवादों के समाधान के लिए नया फ्रेमवर्क पेश किया है, जो पुराने 2018 के नियमों की जगह लेगा। 9 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हुए ये नियम विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाएंगे।
फॉर्मूला-आधारित कैलकुलेशन
सबसे बड़ा बदलाव सेटलमेंट राशि तय करने के तरीके में आया है। पहले यह प्रक्रिया काफी हद तक विवेकपूर्ण (discretionary) थी, लेकिन अब इसके लिए एक स्टैंडर्ड फॉर्मूला लागू किया गया है। अब बेस सेटलमेंट अमाउंट सीधे कानून में निर्धारित न्यूनतम पेनल्टी से जुड़ा होगा। इसमें उल्लंघन की गंभीरता और कार्यवाही के चरण जैसे कारकों के आधार पर एडजस्टमेंट किए जाएंगे।
खास बात यह है कि रेगुलेटर ने अवैध मुनाफे की वसूली (disgorgement) को बेस पेनल्टी से अलग कर दिया है। इससे 'डबल काउंटिंग' की समस्या खत्म होगी और कंपनियों को यह साफ पता रहेगा कि सेटलमेंट चुनने पर उन पर कुल कितना वित्तीय बोझ पड़ेगा।
फास्ट-ट्रैक समाधान की सुविधा
रेगुलेटर ने प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए दो तरह का 'फास्ट-ट्रैक' सिस्टम शुरू किया है:
- छोटे विवाद: जिन मामलों में सेटलमेंट राशि ₹10 लाख तक है, वे अब HPAC की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुजरेंगे, बल्कि सीधे पैनल के पास जाकर जल्दी सुलझ जाएंगे।
- डिस्क्लोजर लैप्स: अगर डिस्क्लोजर में कोई कमी है, तो कंपनी को 'शो-कॉज नोटिस' जारी होने से पहले ही सेटलमेंट नोटिस मिल सकता है। इसके बाद 60 दिन के भीतर कंपनी सेटलमेंट के लिए आवेदन कर सकती है और लंबे विवाद से बच सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
लिस्टेड कंपनियों के निवेशकों के लिए यह एक राहत की खबर है। किसी भी कानूनी जांच के लंबे खिंचने से अक्सर शेयर की कीमतों पर दबाव बना रहता है। अब कंपनियां अनुपालन (compliance) संबंधी मुद्दों को तेजी से सुलझा सकेंगी। हालांकि, यह स्पष्ट होना चाहिए कि सेटलमेंट का मतलब 'गुनाह कबूलना' नहीं है। बाजार अब यह देखेगा कि कंपनियां कितनी तेजी से इन नए रास्तों का इस्तेमाल अपने पेंडिंग विवादों को खत्म करने के लिए करती हैं।
