SEBI का बड़ा कदम: IPO और रीलिस्टिंग नियमों में बदलाव, प्राइस डिस्कवरी को मिलेगी मजबूती

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AuthorNeha Patil|Published at:
SEBI का बड़ा कदम: IPO और रीलिस्टिंग नियमों में बदलाव, प्राइस डिस्कवरी को मिलेगी मजबूती
Overview

भारत के बाजार नियामक SEBI ने आईपीओ (IPO) और रीलिस्टिंग (Relisting) वाले शेयरों के लिए कीमतें तय करने के नियमों में बड़े बदलावों का प्रस्ताव दिया है। इन सुधारों का मकसद प्राइस डिस्कवरी को बेहतर बनाना और ऑर्डर रिजेक्शन को कम करना है।

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रीलिस्टिंग वाले शेयरों का बेहतर वैल्यूएशन

रीलिस्टिंग की तैयारी कर रही कंपनियों के लिए SEBI ने कहा है कि कीमत तय करने में इस्तेमाल होने वाला हालिया ट्रेडिंग डेटा छह महीने से ज़्यादा पुराना नहीं होना चाहिए। यदि पुराना डेटा पर्याप्त नहीं है, तो स्वतंत्र वैल्यूएशन सर्टिफिकेट (Independent Valuation Certificate) की ज़रूरत होगी। अगर कोई शेयर छह महीने से ज़्यादा समय से निलंबित है, तो उसकी बेस प्राइस (Base Price) दो स्वतंत्र विशेषज्ञों की वैल्यूएशन (Valuation) में से कम वाली वैल्यूएशन से तय होगी। इसका मकसद एक ज़्यादा वास्तविक शुरुआती बिंदु तय करना है।

IPO प्राइस सेटिंग्स में सुधार

SEBI मौजूदा IPO प्राइसिंग सिस्टम की समस्याओं को दूर कर रहा है, जिसकी आलोचना खराब प्राइस डिस्कवरी और भारी संख्या में रिजेक्ट हुए बाय ऑर्डर (Buy Order) के लिए की जाती थी, जो कभी-कभी 90% तक पहुंच जाते थे। नई योजना में एक लचीला मैकेनिज्म (Flexible Mechanism) शामिल है: यदि इंडिकेटिव प्राइस (Indicative Price) बैंड की सीमा के करीब पहुंचता है, तो स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange) अपने आप प्राइस बैंड (Price Band) को 10% तक बढ़ा सकते हैं। यदि ऑर्डर प्राइस के एक्सट्रीम (Price Extremes) पर बहुत ज़्यादा केंद्रित हो जाते हैं, तो भी बैंड बढ़ाया जाएगा, बशर्ते कम से कम पांच यूनिक निवेशक (Unique Investors) भाग लें। इन फ्लेक्सिबिलिटीज पर SME IPOs के लिए भी विचार किया जा रहा है, जिनमें फिलहाल ये नहीं हैं, भले ही वे ज़्यादा अस्थिरता का अनुभव करते हों।

कॉल ऑक्शन (Call Auction) को मज़बूत करना

नियामक यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि एक घंटे की प्री-ओपन कॉल ऑक्शन की इंटीग्रिटी (Integrity) बनी रहे। SEBI के प्रस्ताव के अनुसार, फाइनल प्राइस (Equilibrium Price) कम से कम पांच यूनिक खरीदारों (Buyers) और विक्रेताओं (Sellers) के ऑर्डर से तय होना चाहिए। यदि रीलिस्ट या रीस्ट्रक्चर्ड (Restructured) कंपनियों के लिए प्राइस डिस्कवरी मुश्किल है, तो नियमित ट्रेडिंग शुरू होने से पहले एक ज़्यादा भरोसेमंद प्राइस मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए ऑक्शन को अगले ट्रेडिंग दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। SEBI इन प्रस्तावों पर 11 जून तक सार्वजनिक टिप्पणियां मांग रहा है।

ग्लोबल मार्केट के साथ तालमेल

ये प्रस्तावित बदलाव अन्य देशों के नियामकों (Regulators) द्वारा अस्थिरता वाले बाजारों में प्राइस डिस्कवरी में सुधार के प्रयासों के समान हैं। हालांकि SEBI का फोकस कॉल ऑक्शन और प्राइस बैंड एडजस्टमेंट पर है, इसका अंतर्निहित उद्देश्य उचित और व्यवस्थित बाजारों के लिए वैश्विक मानकों के अनुरूप है। इन उपायों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एक्सचेंज इन्हें कैसे अपनाते हैं और बाजार कैसी प्रतिक्रिया देता है, खासकर रीलिस्टेड एंटिटीज़ (Relisted Entities) के लिए स्वतंत्र वैल्यूएशन के उपयोग के संबंध में।

निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है

हालांकि इन सुधारों का लक्ष्य रिजेक्ट ऑर्डर को कम करना और प्राइस डिस्कवरी में सुधार करना है, निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए। रीलिस्टेड शेयरों के लिए स्वतंत्र वैल्यूएशन का उपयोग व्यक्तिपरकता (Subjectivity) और वैल्यूएशन तथा बाजार की मांग के बीच संभावित मिसमैच (Mismatch) पेश कर सकता है। डायनामिक प्राइस बैंड (Dynamic Price Band) का बढ़ना, हालांकि प्राइस डिस्कवरी में मदद करने के इरादे से है, फिर भी शुरुआती ट्रेडिंग में अस्थिरता पैदा कर सकता है। निवेश समुदाय बारीकी से देखेगा कि ये बदलाव आने वाली IPO प्राइसिंग और रीलिस्टेड शेयरों की ट्रेडिंग को कैसे प्रभावित करते हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.