SEBI ने बदले 'फिट एंड प्रॉपर' नियम: इंटरमीडियरी पर डिवेस्टमेंट का बोझ होगा कम

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
SEBI ने बदले 'फिट एंड प्रॉपर' नियम: इंटरमीडियरी पर डिवेस्टमेंट का बोझ होगा कम
Overview

बाजार नियामक SEBI ने मार्केट इंटरमीडियरी (market intermediaries) के लिए 'फिट एंड प्रॉपर' (Fit & Proper) नियमों के ढांचे को और स्पष्ट और सुलभ बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस बदलाव का मकसद अनुपालन (compliance) के बोझ को कम करना और प्रक्रिया को तेज करना है।

SEBI का बड़ा कदम: नियमों में क्या हैं खास बदलाव?

SEBI (Securities and Exchange Board of India) ने अपने इंटरमीडियरी रेगुलेशंस, 2008 के तहत 'फिट एंड प्रॉपर' (Fit & Proper) मानदंडों को लेकर एक महत्वपूर्ण परामर्श पत्र (consultation paper) जारी किया है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य बाजार इंटरमीडियरी पर नियामक अनुपालन (regulatory compliance) के बोझ को कम करना और प्रक्रिया में अधिक स्पष्टता लाना है।

परिसमापन कार्यवाही (Winding-up) और सुनवाई का अधिकार

सबसे अहम बदलावों में से एक यह है कि अब किसी इंटरमीडियरी के खिलाफ परिसमापन कार्यवाही (winding-up proceedings) शुरू होना, उसे स्वतः 'फिट एंड प्रॉपर' न माने जाने का आधार नहीं बनेगा। SEBI ने जोर देकर कहा है कि अयोग्यता का निर्णय अंतिम अदालती आदेशों के आधार पर ही लिया जाएगा, ताकि बिना साबित दोष के किसी पर कार्रवाई न हो। इसके साथ ही, SEBI ने सुनवाई के अधिकार (right to a hearing) को नियमों में स्पष्ट रूप से शामिल करने की बात कही है, जिससे नैसर्गिक न्याय (natural justice) के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित होगा। यह कदम उन इंटरमीडियरी को राहत देगा जो अक्सर लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरते थे। हालांकि, इंटरमीडियरी को अयोग्यता की किसी भी घटना की सूचना SEBI को 7 दिनों के भीतर देनी होगी।

डिवेस्टमेंट से वोटिंग राइट्स पर रोक: एक बड़ा बदलाव

इस प्रस्ताव का एक और क्रांतिकारी पहलू यह है कि यदि किसी व्यक्ति को 'फिट एंड प्रॉपर' नहीं माना जाता है, तो अब उसे अपनी शेयरधारिता (shareholding) का अनिवार्य रूप से डिवेस्टमेंट (divestment) करने की जरूरत नहीं होगी। इसके बजाय, उसके वोटिंग अधिकारों (voting rights) को प्रतिबंधित किया जा सकता है, जबकि वह आर्थिक स्वामित्व (economic ownership) बनाए रख सकेगा। यह उन व्यक्तियों के लिए एक महत्वपूर्ण राहत है जो किसी आरोप के गलत साबित होने पर अपनी पूरी हिस्सेदारी खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहते।

KMP बदलना, अयोग्यता की अवधि और आवेदन प्रक्रिया में तेज़ी

इसके अलावा, अयोग्य पाए गए प्रमुख प्रबंधन कर्मियों (Key Management Personnel - KMP) को बदलने के लिए 30 दिनों का समय दिया जाएगा। SEBI ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी आदेश में पंजीकरण (registration) के लिए अयोग्य (ineligible) घोषित किया जाता है, और उसमें कोई विशिष्ट अवधि नहीं बताई गई है, तो डिफ़ॉल्ट रूप से 5 साल की अयोग्यता अवधि लागू नहीं होगी। अयोग्यता केवल उसी अवधि के लिए लागू होगी जो आदेश में स्पष्ट रूप से बताई गई हो। SEBI ने आवेदन प्रक्रिया को भी सुव्यवस्थित किया है। अब, यदि किसी आवेदन पर शो-कॉज नोटिस (show-cause notice) जारी होने के एक साल के बजाय केवल 6 महीने तक कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो उसे अमान्य माना जाएगा। यह इंटरमीडियरी पर अनुपालन के बोझ को कम करेगा और बाजार में प्रवेश को आसान बना सकता है।

अंतरराष्ट्रीय तुलना और SEBI का विकसित दृष्टिकोण

SEBI का यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। अमेरिका या यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में, लंबित कार्यवाही को अयोग्यता का सीधा आधार नहीं माना जाता, जबकि SEBI के पिछले नियमों में कभी-कभी सख्त, नियम-आधारित अयोग्यताएं होती थीं। 2021 के बाद से, SEBI सिद्धांत-आधारित आकलन (principle-based assessments) और नियम-आधारित मानदंडों (rule-based norms) को मिलाकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपना रहा है, जो वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं (global best practices) के साथ संरेखण को दर्शाता है।

बाजार पर संभावित असर

यह नियामक सुधार भारतीय वित्तीय क्षेत्र (financial sector) के लिए सकारात्मक माने जा रहे हैं। NIFTY FINANCIAL SERVICES इंडेक्स का मौजूदा P/E 17.85 है, जो इस क्षेत्र के लिए एक उचित मूल्यांकन (valuation) दर्शाता है। इस कदम से नए इंटरमीडियरी के लिए बाजार में प्रवेश आसान हो सकता है, जिससे प्रतिस्पर्धा (competition) को बढ़ावा मिलेगा और बाजार की भागीदारी बढ़ेगी। यह भारतीय वित्तीय क्षेत्र के 7.5% से 7.8% की अनुमानित वृद्धि के अनुरूप है, जो कि मजबूत घरेलू मांग और नीतिगत सुधारों पर आधारित है।

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