भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इक्विटी डेरिवेटिव्स के लिए मार्जिन नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब लंबे समय के कंट्रैक्ट्स (long-dated contracts) की अवधि को 9 महीने से बढ़ाकर 13 महीने कर दिया गया है और रिस्क मॉडलिंग को 16 से बढ़ाकर 44 सिनेरियो तक कर दिया गया है।
हेज्ड पोर्टफोलियो के लिए घटेगी लागत
SEBI का यह कदम बाजार की सुरक्षा को पोर्टफोलियो के वास्तविक जोखिम के साथ बेहतर ढंग से जोड़ने के लिए उठाया गया है। नए नियमों के तहत, 13 महीने तक के डेरिवेटिव कंट्रैक्ट्स पर सख्त मार्जिन की जरूरतें नहीं होंगी। इससे उन निवेशकों को फायदा होगा जो अपने पोर्टफोलियो को लंबी अवधि के लिए हेज (hedge) करना चाहते हैं। पहले 9 महीने से अधिक के कंट्रैक्ट्स पर अधिक मार्जिन देना पड़ता था, जिससे लंबी अवधि के हेजिंग की लागत बढ़ जाती थी।
जोखिम का बेहतर आकलन
SEBI ने स्टैंडर्ड पोर्टफोलियो एनालिसिस ऑफ रिस्क (SPAN) सिस्टम के तहत वर्तमान 16-सिनेरियो विश्लेषण को बढ़ाकर 44-सिनेरियो कर दिया है। इसका मतलब है कि अब किसी पोर्टफोलियो के संभावित नुकसान का और भी सटीक आकलन किया जा सकेगा। इस उन्नत रिस्क मॉडलिंग से एक्सट्रीम लॉस मार्जिन (ELM) को भी नए सिरे से कैलिब्रेट किया जाएगा। उम्मीद है कि इससे विशेष रूप से इंडेक्स ऑप्शन स्ट्रैटेजी और कैलेंडर स्प्रेड जैसे हेज्ड पोजीशन के लिए मार्जिन की आवश्यकताएं कम हो सकती हैं। कुछ इंडेक्स ऑप्शन स्ट्रैटेजी में यह 50% तक और कैलेंडर स्प्रेड में 30% तक कम हो सकती है।
सट्टेबाजी पर नकेल जारी
SEBI ने हेज्ड पोजीशन के लिए लचीलापन तो बढ़ाया है, लेकिन सट्टेबाजी (speculation) पर नकेल कसने की अपनी प्रतिबद्धता भी बनाए रखी है। सेटलमेंट और एक्सपायरी वाले दिनों में अत्यधिक सट्टेबाजी को हतोत्साहित करने के लिए मार्जिन की आवश्यकताएं ऊंची रखी जाएंगी। कैलेंडर स्प्रेड के लिए शुल्क (charges) को भी बदला जा रहा है। वर्तमान 1.75% के फ्लैट शुल्क के बजाय, अब एक वेरिएबल स्केल का उपयोग किया जाएगा जो स्प्रेड के दोनों लेग्स के बीच समय के अंतर के आधार पर एडजस्ट होगा।
यह नया, जोखिम-संवेदनशील दृष्टिकोण भारतीय बाजार के मानकों को वैश्विक प्रथाओं के करीब लाएगा, जहां मार्जिन लागत सीधे निवेशक द्वारा उठाए गए जोखिम के स्तर से जुड़ी होती है। हालांकि, फ्यूचर्स पोजीशन और नेकेड शॉर्ट ऑप्शंस पर मार्जिन आवश्यकताओं में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है। निवेशकों को इन नए नियमों के लागू होने की समय-सीमा और उनके ट्रेडिंग खातों पर इसके सटीक अनुप्रयोग के लिए एक्सचेंजों द्वारा जारी किए जाने वाले सर्कुलर पर नजर रखनी चाहिए।
