SEBI ने 2026 के नए सेटलमेंट रेगुलेशन पेश कर दिए हैं, जो 2018 के पुराने नियमों की जगह लेंगे। अब पेनल्टी का कैलकुलेशन एक पारदर्शी फॉर्मूले से होगा। छोटी गलतियों के लिए फास्ट-ट्रैक रास्ता और पुराने रिजेक्ट हुए मामलों के लिए 90 दिनों की खास एम्नेस्टी विंडो दी गई है।
सेबी (SEBI) ने मार्केट पार्टिसिपेंट्स के खिलाफ चल रहे कानूनी और प्रशासनिक मामलों को निपटाने की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। 'Settlement of Administrative and Civil Proceedings Regulations, 2026' के तहत अब नियमों में स्पष्टता और तेजी लाने की कोशिश की गई है।
पेनल्टी का नया फॉर्मूला
सबसे बड़ा बदलाव पेनल्टी कैलकुलेशन को लेकर है। पहले यह काफी हद तक субъекटिव (Subjective) हो सकता था, लेकिन अब एक स्पष्ट गणितीय फॉर्मूला लागू होगा। इसमें जुर्माने की रकम, उल्लंघन की गंभीरता और आवेदक की प्रोफाइल के आधार पर तय होगी। इसके अलावा, रेगुलेटर ने 'डिस्गॉर्जमेंट' (गलत तरीके से कमाए गए मुनाफे की वापसी) को पेनल्टी कैलकुलेशन से अलग कर दिया है, ताकि कंपनियों को अपनी कुल देनदारी का सही अंदाजा रहे।
छोटे मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सुविधा
SEBI अब 'वेल्स नोटिस' (Wells Notice) सिस्टम ला रहा है, जिससे औपचारिक आरोप तय होने से पहले ही मामलों को सुलझाना आसान होगा। ₹10 लाख से कम के छोटे मामले या डिस्क्लोजर से जुड़ी गलतियों के लिए फास्ट-ट्रैक रास्ता बनाया गया है, जिससे लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचा जा सकेगा।
पुराने केस के लिए 90 दिन की एम्नेस्टी
जो कंपनियां पहले के नियमों के तहत अपने सेटलमेंट से बाहर हो गई थीं, उनके लिए 90 दिन की एक बार की एम्नेस्टी विंडो खोली गई है। हालांकि, इसके लिए उन्हें तय पेनल्टी पर 20% का अतिरिक्त प्रीमियम देना होगा।
गंभीर मामलों में भी राहत
अब वित्तीय हेरफेर और फंड की हेराफेरी जैसे गंभीर मामलों में भी सेटलमेंट की अनुमति दी जाएगी, बशर्ते कंपनियां सही जानकारी साझा करें और फंड वापस लौटाने जैसी शर्तों को मानें। साथ ही, शो-कॉज नोटिस मिलने के बाद जवाब देने या सेटलमेंट की अर्जी लगाने का समय 60 दिन से बढ़ाकर 90 दिन कर दिया गया है।
