SEBI ने 2026 के लिए नया सेटलमेंट फ्रेमवर्क पेश किया है। इसके जरिए कंपनियां अब कानूनी पचड़ों में फंसने से पहले ही विवादों को सुलझा सकेंगी, ताकि निवेशकों का पैसा तेजी से वापस मिल सके।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने प्रवर्तन नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 'सेटलमेंट ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव एंड सिविल प्रोसीडिंग्स रेगुलेशंस, 2026' लॉन्च किया है। इसका मुख्य उद्देश्य कंपनियों से हेरफेर किए गए या निकाले गए फंड की तत्काल रिकवरी सुनिश्चित करना है।
नई व्यवस्था का फायदा
इस रेगुलेशन के तहत, SEBI ने 'प्री-शो-कॉज सेटलमेंट नोटिस' की सुविधा दी है। अब किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले, कंपनियों के पास 60 दिन की मोहलत होगी, जिसमें वे सेटलमेंट के लिए आवेदन कर सकेंगी। इसका मकसद कोर्ट के लंबे चक्कर से बचना और मामले को समय रहते सुलझाना है।
सेटलमेंट का गणित
यह प्रक्रिया सिर्फ पेनल्टी तक सीमित नहीं है। कंपनियों को गलत तरीके से कमाए गए मुनाफे (wrongful gains) को वापस करना होगा और रेगुलेटरी शर्तों को मानना अनिवार्य होगा। अगर कंपनी सेटलमेंट चुनती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसने गलती मान ली है, लेकिन उसे कैपिटल, ब्याज और पेनल्टी की भारी रकम चुकानी पड़ सकती है।
पुरानी फाइलें होंगी बंद
जो पुराने मामले 2018 के फ्रेमवर्क के तहत रिजेक्ट हो गए थे, उनके लिए SEBI ने 90 दिन की एक विशेष खिड़की खोली है। ऐसी कंपनियां पुरानी कैलकुलेटेड रकम के साथ 20% की अतिरिक्त पेनल्टी भरकर अपना मामला क्लोज करवा सकती हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
SEBI इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या इन प्री-शो-कॉज नोटिस को 'मटेरियल इवेंट' माना जाए और शेयर बाजार में इसका खुलासा करना अनिवार्य हो। अगर ऐसा होता है, तो निवेशकों को कंपनी की गड़बड़ियों की जानकारी बहुत पहले मिल जाएगी, जिससे रिस्क का बेहतर आकलन करना संभव होगा।
